9/9/07

वो हमारे गांव की पगडडी थी ये हमारे महानगर की सड़के है

वो हमारा गाँव था
और वे थी हमारे गाँव की सडकें
सडकें भी कहाँ?
पगडंडियाँ!
टूटी फ़ूटी, उबर ख़ाबर
पर उन पर चल कर हम
न जाने कहाँ कहाँ पहुँच जाते थे
दोस्तों , रिश्तेदारो , नातेदारों
और न जाने किनके किनके घरों तक
ये हमारा महानगर है
यहाँ की सडकें बहुत सुन्दर है
चौडी चौडी, एक दम चिकनी
मगर इन पर चल कर
मैं कहाँ जाउँ?

12 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत गहरी बात कह रही हैं यह पंक्तियाँ, बधाई.

Gyandutt Pandey ने कहा…

वो पगडण्डियां जाती थीं छुट्टन, बब्बन के घर; फत्ते और बनिया की दूकान पर. ये सड़कें जाती हैं कॉक्रीट के जंगल में!

Mired Mirage ने कहा…

बहुत सही बात आपने इतने कम शब्दों में व बड़ी अच्छी तरह कह दी ।
घुघूती बासूती

महावीर ने कहा…

बहुत खूब!

दीपक भारतदीप ने कहा…

आप अपने शब्द और भाव व्यक्त करते रहे तो मुझे भी बहुत सुविधा होगी। आपके यह रचना पढ्कर मेरे मन में यह शब्द घुमड रहे हैं 'गांव की पगडंडिया और महानगर की सड्कें। देखते हैं अब क्या बनता है पर आपके शब्द ह्रदय स्पर्शी हैं।
दीपक भारतदीप्

vimal verma ने कहा…

अच्छी कविताएं लिखते हैं आप..इन्ही पगडंडियों से तो हम कहां कहां पहुंच गये.. क्या बात है..

anitakumar ने कहा…

बसंत जी बम्बई की तो सड़केंb भी आप के गावं की पगडंडियों से गयी गुजरी हैं और सिर्फ़ दो दिशा में जाती हैं, दफ़्तर और घ्रर्।॥पर बात आपने बहुत पते की कही

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

एक अच्छे और कुशल रचनाकार की सफलता की यही कसौटी होती है.बहुत गहरी है पंक्तियाँ, 'गांव की पगडंडिया और महानगर की सड्कें। बहुत खूब, आपके शब्द ह्रदय स्पर्शी हैं।
मेरे दोस्त, बहुत उम्दा लिखते हो, इस क्रम को बनाए रखो . बधाई...../

दीपक भारतदीप ने कहा…

हिंदी दिवस पर मेरी तरफ़ से बधाई
दीपक भारतदीप्

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

आपने अपने शब्दों के द्वारा शहर की पीडा को भलीभांति उजागर किया है। बधाई स्वीकारें।

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

आपकी कविता के बहाने कुछ अपनी बात

प्रिय बसंत जी,
विगत 09 सितंबर से एक ही कविता आपके ब्लॉग पर '' गाँव की पगडंडी और महानगर की सड़कें ''आँखों के सामने आ रही है, अब तो बदल दो भाई, ये आँखें हमेशा कुछ नया - नया चाहती रहती है. भाई क्या करूँ दिल है की मानता नही. वैसे आप मयानगरी में रहते हैं और मैं मायावती की नगरी में. माया दोनों जगह है, मगर अलग - अलग रूप में. आपकी मयानगरी में अक्सर अपाहीज़ों का खेल होता है , और अंधे तमाश्वीन होते हैं. हमारी मायानगरी में अंधे खेलते भी हैं और अंधे तमाश्वीन भी होते हैं. यानी दोनों जगह कमोवेश एक जैसी स्थिति है. इससे अच्छा तो अपना गाँव था , अपनी पगडंदियाँ थी इन सिक्स लेन सड़कों से वेहतर ज़रूर थी . न कोई दिखावा , न कोई बनावटीपन . ज़िंदा रहती है भावनाएँ एक - दूसरे के प्रति. अब तो काफ़ी हद तक हम उलझते जा रहे हैं मकड़ज़ालों में. घर में ''कसौटी ज़िंदगी की'' वाली स्थिति तो दफ़्तर में '' बने रहो पगले'' वाली स्थिति. हमारे एक कार्यलयी मित्र पिछले दिनों तीन पद पदोन्नति पाए, मैने जब इस सफलता का राज जानना चाहा तो उन्होने कहा कि भाई रवीन्द्र, हर व्यक्ति का अपना एक वसूल होता है , पहले गुरु मानो फिर सफलता का राज बताऊँगा . अब जब कुछ सीखना है तो गुरु मानने में क्या हर्ज़्ज़ ? लोग तो समय पड़ने पर गधे को भी अपना बाप बनाने से नहीं हिचकिचाते , फिर मुझे गुरु बनाने में क्या परेशानी ? सो मैने उन्हे दंडवत प्रणाम किया, और कहा - बताएँ मेरे गुरुघंटाल ! क्या है इस सफलता का राज ? उनके चेहरे पर मुस्कुराहट देखते बन रही थी, शायद वह अंदर हीं अंदर सोच रहा होगा, कि आया ऊँट पहाड़ के नीचे. उन्होने सफलता के जो सूत्र बताए वह वाकई विचित्र किंतु सत्य था, आप भी सुन लीजिए-
() पहला सूत्र - बने रहो पगले, काम करे अगले.
() दूसरा सूत्र - बने रहो फूल, सैलरी पाओ फूल .
() तीसरा सूत्र - काम से डरो नही, पर काम को करो नहीं .
() चौथा सूत्र - यदि काम का लोगे टेंसन,फ़ैमीली पाएगी पेंशन .
() पाँचवा सूत्र - काम करो या ना करो, काम की फीकर ज़रूर करो. और काम की फीकर करो या ना करो, मगर ज़ीकर ज़रूर करो.
सफलता के इस पाँच सूत्र को आपनाओ ,पदोन्नति पाओ, आगे बढ़ते चलो जाओ. बसंत भाई, इसी को कहते हैं महानगरिए बिंदास ज़िंदगी . नेरा मानना है कि सबकुछ तो है महानगर में मगर आत्मग़ौरव नही है और जो आत्मग़ौरव के साथ नही जीता वह जीवन का सच्चा आनंद पा ही नही सकता. इसलिए मेरे मित्र-

जब झूमकर घटा छाये और टूट कर वारास जाए
तुम लौट जाना अपने गाँव
अलाप लेते हुए धानरोपणी गीतों का
कि थ्रेशर - ट्रेक्टर के पीछे खडे बैल
तुम्हारा इंतज़ार करते मिलेंगे
कि खेतों में , दलानों में मिलेंगी
करवट लेती बीज में पेड़
पन्पियाई लेकर प्रतीक्षारत घरनी
मुस्कुराती हुई बागमती की धार
और गाते हुए नंग - धरन्ग बच्चे-
''काल - कलवती , पीअर धोती, मेघा सारे पानी दे......!''

बेनामी ने कहा…

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regds rachna