19/7/07

किस्सा अमिताभ बच्चन , रेखा और एक बकरी का

आप कलेक्टर हैं, आपके पिताजी कलेक्टर है या कि आप स्वय कलेक्टर साहब के पिताजी है इससे कोइ फर्क नहीं पड़ता. आप जरूर बहुत बडे तोप होंगे . पर निश्चित रूप से अपने बाथ रूम के अन्दर होंगे . आप जो भी तोप , तमंचा या तलवार हो किंतु अगर आप हिन्दी फिल्मों से वाकिफ हैं तो फिल्म सितारों के प्रति लोगों की दीवानगी से नावाकिफ नहीं होंगे.
एक बूढ़े कलेक्टर साहब मिले. मुँह के दाँत गिर चुके हैं. सेवा से रिटायर्ड हैं और अब पुराने दिनों की यादो की जुगाली करते हुए दिन बिताते है. गर्मी की छुट्टियों में गांव गया था तो उनसे मुलाकात हुई. एक दूसरे से मिलकर हम दोनों अति प्रसन्न हुए. फिल्म, साहित्य और कुल मिलाकर जिंदगी के अनेकानेक पहलुओ पर कई दिनों चर्चा चली. एक दिन उन्होंने एक घटना का जिक्र किया. बोले उमराव जान की शूटिंग लखनऊ में हुई थी. और जब शूटिंग हो रही थी वे तब वहाँ के जिला मजिस्ट्रेट थे. रेखा को उन्होने तब वही साक्षात देखा था और तब से अब तक वह उनकी आँखों के आगे गाहे बगाहे वही बोल बोल कर फुर्र हो जाती है कि दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए . वे शूटिंग के लिए वहाँ लखनऊ आयी थी. उन्होने रेखा के बहुत अनुरोध करने पर उसके साथ अपना एक फोटो भी अपने निजी कैमरे से निकलवाया था ताकि सनद रहे. और जब कैमरा कलेक्टर साहब का अपना था तो जाहिर है फोटोग्राफर भी उनका अपना ही रहा होगा. तो फोटो निकाली साहब के एक परम प्रिय चपरासी ने. जब फोटो साफ कराया गया तो चपरासी की फोटोग्राफी की प्रतिभा और कैमरे की विलक्षण क्वालिटी का पता चला. फोटो में न रेखा थी न कलेक्टर साहब थे. था तो बस आधे फ़ोटो में जमीन थी और आधे में आसमान था. इस तरह शेर गलत साबित हो रहा था कि
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कभी जमीं मिलती है तो आसमां नहीं मिलता
इस तस्वीर में मुकम्मल जहां था , जमीन भी थी और आसमान भी था. बस नहीं था तो कलेक्टर साहब नहीं थे और रेखा नहीं थी. वह तस्वीर उन्होंने बड़े जतन से संभाल कर अपने अलबम में रखी हुई है जिसे देख कर हम भी धन्य हो गए.
मान लीजिए , क्योंकि मानने के अलावा और कोइ उपाय नहीं है. आप आज अमिताभ बच्चन से मिलें उनके साथ एक तस्वीर निकलवाने का सौभाग्य भी आपको प्राप्त हुआ. या तस्वीर भी छोडिये आपने अमिताभ बच्चन का साक्षात दर्शन किया. तो आप जिस दिन मृत्यु शय्या पर भी होंगे और चर्चा चलेगी तो आप झट उठ कर कहेंगे कि आपने अमिताभ बच्चन को करीब से देखा है और उनके साथ आपका फोटो भी है. अपने बेटे , पोते , पोतियों , नातियों , सब को जब जब आपको मौका मिलेगा बतायेंगे कि उनके साथ आपकी तस्वीर है .
मैने मुम्बई के एक फर्निचर शाँप में आमिर खान को देखा. लडकियाँ आस पास मडरा रही थी और लडके और बूढे लडकियों के आस पास मडरा रहे थे. तभी एक मुसलिम लड़की ने आमिर को देखा और देखते ही चिल्लायी – आ..........मिर भा..........ई........फिर चिल्लाती हुई उससे लिपटने के लिए उसकी और दौडती हुई भागी. मगर हाय रे किस्मत और हाय रे किस्मत की मार ! बेरहम सिक्यूरिटी वालों ने इस बिछडी हुई बहन को अपनी मंजिल तक पहुँचने से पहले ही रोक लिया. हालांकि बहन जी अपनी प्रूरी ताकत के साथ सिक्यूरिटी वालों से जूझ रही थी और लगातार आमिर भाई आमिर भाई चिल्लाये जा रही थी. शायद इसी का असर हुआ कि किसी तरह आमिर ने खुद आगे बढ़ कर उससे हाथ मिलाया और हाथ भी क्या मिलाया दोनो की दो- दो उंगलियां 1/10 सेंकेंड के लिए एक दूसरे को छू गयी होगी . और इतने में ही दोनों वहां मौजूद सिक्यूरिटी वालों की मदद से सदा के लिए जुदा हो गये. पांच फीट की लड़की फर्निचर शाप से बाहर निकली तो छे छे फिट ऊपर उछल रही थी. बल्कि लोगों ने देखा कि लड़की के पाँव आधे घंटे के लिए, जब तक वह वहाँ रही, जमीन पर पड़े ही नहीं.
लेकिन हम ठहरे निपट गाँव के आदमी. हमारे दादा जी जो अब नहीं रहे ने कभी कोई फिल्म नहीं देखी थी . वे अमिताभ बच्चन या रेखा को भी नहीं जानते थे. पिछले साल हम गाँव गये तो अपना डिजिटल कैमरा लेकर गये थे. लोगों की खूब तस्वीरे उतारी क्योंकि कोई खर्चा तो होना नहीं था. गाँव का फील देने के लिए कुछ लोगों से उन्हें अपने कन्धे पर आस पास बेवजह मिमिया रही बकरियो को उठा लेने को कहा. तस्वीरें अच्छी आयी. कुछ दिनों बाद फिर गाँव गये तो लोगों ने कहा कि हमारी भी एक तस्वीर बकरी के साथ निकालो. गाँव भर से बकरियाँ खोज खोज कर लायी गयी और हमने कई बकरियों और बच्चों की तस्वीरें निकाली. मेरी पाँच साल की बेटी गाँव से वापस मुम्बई के लिए चली तो खूब रोई. बोली एक बकरी साथ ले चलो. खैर बकरी तो नहीं ला पाये. पर ये यादे साथ आ गयी
तो कुल मिला कर कहने का मतलब ये था कि आज भी हमारे गाँव के बच्चो और बूढों के लिए एक बकरी अमिताभ बच्चन और रेखा से बढ़कर है क्योंकि उन्हें वे कन्धे पर बिठा सकते है, गोद में ले सकते है. बकरी उन्हें दूध भी देती है. आखिर गांधी जी ही तो इसी बकरी के दूध को हजार नियामत से बढाकर मानते थे . ये फिल्म स्टार तो उन्हें सुनहरे सपनों के सिवा कुछ दे नहीं पाते. चलिए चलते चलते वह शेर सुन लीजिए जो गांव की ही एक बकरी ने बड़ी मासूमियत के साथ मेरे कान में सुनाया था.

आप मेरा कत्ल करेंगे इसकी तो उम्मीद थी
पर उस दिन क्यों किया जिस दिन बकरीद थी.

6 टिप्‍पणियां:

Sanjeet Tripathi ने कहा…

बहुत खूब!!

Udan Tashtari ने कहा…

बढ़िया गपियाते हो भाई. लगे रहो. कौन गाँव है भई जहाँ बकरियाँ मिल गई?

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत सही। बकरियां सबसे सुंदर् हैं।

Sagar Chand Nahar ने कहा…

बहुत मजा आया, मुजे भी इस बात का गुमान था कि मैं भारत के लगभग चार प्रधानमंत्रियों से बात कर चुका हूँ , और कई फिल्म स्टार से भी, अब लगता है जब बकरी से नहीं मिला तो सब बेकार है।
इस बार गाँव जाने पर बकरी के साथ जरूर फोटो खिंचवानी पड़ेगी।
॥दस्तक॥ और
गीतों की महफिल

sanjay tiwari ने कहा…

लीजिए थोड़ा हौसलेवाला टानिक हमारी तरफ से भी. वैसे आपके लेखन को इस टानिक की खास जरूरत है नहीं. आपके लिखने में जो ठहराव है वह इंटरनेट पर भी रोक लेता है. कहीं आप व्यंगकार तो नहीं हैं?

नितिन बागला ने कहा…

बहुत खूब लिखा है, और तस्वीरें बेहद अच्छी लगीं...

सागर भाई, ये "लगभग चार प्रधानमंत्री" कैसे होते हैं ? :)