6/10/07

ये है मुंबई मेरी जान : जाने पहचाने अनजाने लोग

सो‍चता हूं और सं‍भव है कि शीर्षक पढ कर आप भी सों‍चने लगे़‍ कि जो जाने पहचाने हैं वे अनजाने कैसे हो सकते हैं‍. और जो अनजाने है वो जाने पहचाने कैसे हो सकते हैं. कबीर की उलटवांसी जैसी लगती है न? पर मुम्बई शहर ही उलटवासियो‍ का है.
सुबह सुबह उठता हूं. प्रातः भ्रमण के लिए निकलता हूं तो सबसे पहले बिल्डि‍न्ग के वाचमैन दिख जाते हैं . कोई लोगो की कार धुलाई कर रहा होता है तो कोई मोटर से पानी चढा रहा होता है. इन्हे पह्चानता हूं पर इनके बारे मे कुछ जानता नही हूं. ये कहाँ से आये हैं , कहाँ रहते हैं . कैसे खाते पीते हैं, कैसे जीते हैं. कुछ भी तो नहीं जानता. बाहर निकलते ही सडक पर एक आदमी दिखता है. कुत्तों को बिस्किट खिला रहा होता है. कुत्तों को भी पहचानता हूँ और बिस्किट खिलाने वाले सज्जन को भी. पर उन्हें जानता नहीं हूँ. एक लडकी हाथ में मिनरल वाटर की बोतल लिए दौडती रहती है. शायद किसी मैराथन में भाग लेना हो. पर उसे भी नही जानता. सुबह दफतर के लिए निकलता हूँ तो प्लेटफार्म पर कितने लडके और लडकियाँ दिखते हैं . एक दूसरे का इंतजार करते , गपियाते, बतियाते. किनका किनसे कौन सा रिश्ता है ये पता है . उन्हे घूरते बूढों को भी पहचानता हूँ . ये भी पता है कि इन भूतपूर्व जवानों के भी घूरने के अपने जोडे फिक्स हैं. पर इनमे से किसी को भी मैं कहाँ जानता हूँ. यही हाल दफ्तर और दफ्तर के बाहर है. सैकडों लोगों को पहचानता हूँ कि ये हमारे दफ्तर में है. पान की दुकान पर निश्चित समय पर आकर पान खाने वाले उस भाई को पहचानता हूँ. आंख बन्द कर पूरी शिद्दत से सिगरेट पीने वाली लडकी को भी पहचानता हूँ ,पर इनमे से किसी को भी कहाँ जानता हूँ? न ही जानने की कोशिश करता हूँ. और ब्लाग की दुनिया के कितने ही लोग हैं जिन्हें अच्छी तरह जानता हूँ पर उन्हे पहचानता नही हूँ. है न ये अजीब बात? पर इसी को कहते हैं कि ये है मुम्बई मेरी जान!

6 टिप्‍पणियां:

Gyandutt Pandey ने कहा…

अगर यही है "मुम्बई मेरी जान" तो हम भी मुम्बई में हैं। कहां जान कर भी जानते हैं बहुतों को!

एक दिन यूंही मैने एक चाय की दुकान वाले से पूछ लिया कि क्या हुआ, कल दुकान नहीं खुली? अगले दिन से वह परिचित हो गया। दुआ-सलाम होने लगी।

सिगरेट वाली लड़की से बोल कर देखियेगा। :-)

बोधिसत्व ने कहा…

पहल से हल निकलता है....करें...

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

बसंत जी,
क्या बात है, महानगर में रहते हुए कई बरस बीत गये और आज पता चला मुंबई के बारे में.
व्यंग्य निहसंदेह धारदार है. आपने तो सारी बातें पर्दे में ही कहने की कोशिश की है, इसके अतिरिक्त भी है अजीबोग़रीब मेरी जान मुंबई में . भाई ओम व्यास कहते हैं की महानगर में अच्छे - अच्छे लोगों की पहचान उसके कुत्तों से ही होती है . है ये अजीब बात? नि: संदेह भावपूर्ण है, अच्छा लिखते हैं आप!वैसे क्रम बनाए रखें.

बेनामी ने कहा…

Vasantji! Mahanagar me hum sabko pahchante hain par khud ko pahchanne- janne ki koshish karne ki fursat hi kahan!
Aap to sabki dukhti rag ko ched rahe hai.
Is sahar ki bheed bhari tanhaioon ka ek sach yeh bhi hai ki aap yahan masheen ki tarah chalaye jate hain aur doosaroon ko bhi isi tarah chalane ki koshish me lag jate hain...masheen ki tarah.
Shivpratap yadav
shivyad@rediffmail.com

anitakumar ने कहा…

बहुत सच कहा आपने, अजी वाचमेन को छोड़िये पड़ोसी जिसके साथ रोज लिफ़्ट में आना जाना होता है उसे पहचानते है क्या? पहचानने की इच्छा हो तो शुरुवात कर दिजिए, यहाँ लोग अपने बारे में बोलने को सदा आतुर रहते हैं, बस आप पोलिस वाले नहीं ये यकीन दिला दिजिए

Neeraj Goswamy ने कहा…

बसंत जी
क्या इतेफाक है ...( हसीन कहूँ ...अगर बुरा ना माने तो ?)
"आप भी मुम्बई मैं रहते हैं और मैं भी .(मुम्बई के पास ही खोपोली ,लोनावला मैं )
आप को हंसते हुए लोग देखना अच्छा लगता है और मुझे भी.
आप भी ग़ज़लें पसंद करते हैं और मैं भी .
आप भी कभी कभी लिख लेते हैं और मैं भी.
आप भी कहीं कहीं पढ़ लेते हैं और मैं भी .
आप भी ब्लॉग लेखन करते हैं और मैं भी.
आप को छोटी सी बात और डोर फ़िल्म पसंद है और मुझे भी .
आप भी चश्मा लगाते हैं और मैं भी .
आप के सर पे बाल सलामत हैं और मेरे भी .
आप की मूंछे हैं और मेरी भी लेकिन आप सी नहीं, पर हैं .
आप भी मेल हैं मैं भी ".
जब इतनी सारी बातें एक हैं तो फिर हम एक दूसरे से अभी तक मिले क्यों नहीं ?
जवाब है तो 09860211911 पर दीजियेगा, इंतज़ार रहेगा
नीरज