4/6/09

प्रेम गली से गुजरो तो

एक अरसा बीत गया आप लोगों से मिले हुए. ये कहना भी कुछ सही नहीं है. बल्कि कहना चाहिए कि एक अरसा हो गया आप लोगों को मुझ से मिले हुए. आप लोगों से तो मैं मिलता ही रहता हूँ. एक मुक्तक से अभी अभी मुक्त हुआ हूँ तो इस बार वही आपके हवाले--

दिल को दिल तक जाने में एक जमाना लगता है

उन आँखों केअंदर मुझको एक मयखाना लगता है

कोई पागल , कोई मजनू , कोई दीवाना कहता है

प्रेम गली से जो गुजरो तो ये जुरमाना लगता है.

8 टिप्‍पणियां:

संध्या आर्य ने कहा…

वाह क्या बात कह दी है आपने जैसे मानो मेरे दिल की बात कह दी हो .......पर चौथी लाइन मुझे समझ मे नही आयी कृपया बताने की जहमत करेगे क्या?
यह मात्र गुजारिश है

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

दिल से दिल तक जाने में एक जमाना लगता है।

बहुत गहरी बात कही है आपने।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

बेनामी ने कहा…

kyaa baat kah di aapne .....hum ashiko ka to yahi inam hai bhai

Nirmla Kapila ने कहा…

बसंतजी पहली बार आपका ब्लोग देखा है पहली नज़र मे ही इसने जादू कर दिया है बहुत बडिया मुक्तक है बधाई

Dileepraaj Nagpal ने कहा…

Bahut Khoob Sir Jee...

श्याम सखा 'श्याम' ने कहा…

दिल से होकर दिल तलक इक रास्ता जाता तो है
और गर कुछ है नहीं ये इश्क इक धोखा तो है

यह बाधा शब्द वेरिफ़िकेश्न ह्टाएं
श्याम

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

वाह.. बसंत जी वाह..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सीधे-सादे शब्दों में बढ़िया मुक्तक।
बधाई।
शब्द-पुष्टीकरण हटा दे।