2/11/07

रोजगार ढूंढना भी एक रोजगार है

आजकल बेरोजगारीका यह आलम है कि रोजगार दफ्तर भी अब बेरोजगार पडॆ हैं . बल्कि लेटे - लेटेकराह रहे हैं. पहले एक - आध बेरोजगार कहीं से घूमता - भटकता दफ्तर मे आ जाता था कि मुझे रोजगार दो. तो दफ्तर वाले उसे समझाते थे कि फलाँ फार्म भर दो, ढिकाँ जगह जमा करा दो. फिर जब तुम्हे खबर देंगे तो वहाँ जाकर ज्वायन कर लेना . पर धीरे - धीरेलोगो को पता लग गया कि फलाँ फार्म भरकर ढिकाँ जगह जमा कर देने भर से कुछ होना जाना नही है तो लोगो ने उस मन्दिर की राह जाकर सिर पटकना बन्द कर दिया.


बड़े बूढे कहते हैं पहले रोजगारदफ्तर वाले गली - गलीघूमते थेऔर ढूँढते रहते थे कि किसे रोजगार दिया जाये ? कोई जरा सा योग्य मानुस दिखा नहीं कि उसे पकड़ कर बिठा देते थे कि भैयायहाँनौकरी करनी पड़ेगीऔर आदमी मजबूरी मे काम करने लगता था. पर अब वो दिन हवा हुए और नौकरी देने वाले पकड़ पकड़ करलोगों को स्वैच्छिक अवकाश पर जाने के लिए मना रहे हैं. और जो नहीं मान रहे उन्हें धक्के देकर बाहर कर रहे हैं. जो लोग कम्प्यूटर बाबा की लाठी टेकते हुए जर्मनी और अमेरीका एक्स्पोर्ट हो गये थे , वे भी वापस आकर देश मे चौथाई तनखाह पर रोजगार तलाश रहे हैं


देश के प्रधान मंत्री ने किसी दिन एक फाइव स्टार रिसोर्ट मे बैढकर चिंतन कियातो बेरोजगारी की हालतदेखकरवे द्रवित हो गये .जी मे तो आया कि फटाफ़ट पूर्व प्रधान मंत्रियों की तर्ज पर दो - चार कवितायें लिख डालें . पर कुछ सोच कर रह गये और सीधे यही घोषणाकर दी कि सरकार एक करोड़ लोगो को रोजगार देगी. बाद मे लोगो ने पूछा कि सरकार के उस वायदे का क्या हुआ? इस बात पर सरकार भन्ना गई. उसका भन्नाना भे स्वाभाविक है. अब अकेली सरकार क्या क्या करे बेचारी.


वह नदियों को आपस मे जोडे या लोगों को. वह समन्दर के अन्दर सेतु की रक्षा करे या अपनी. वह बैंकों की ब्याज दर घटाने मे समय लगाये या बेरोजगारी घटाये. वह अयोध्या मे मन्दिरबनाये. ये आपके भुक्खड पेट की आग बुझाये. वह करोड पति क्रिकेट खिलाडियों को टैक्स मे रियायत दे या पिद्दी जनता की कोटरो मे धंसी आँखे निहारे. अब समस्याओं पर समस्यायेंहै . पाकिस्तान है . कश्मीर है. बाँगला देशी है. नये राज्यो की डिमांड है.परमाणु समझौते हैं.


गजब के हो तुम भी. यहाँ हम कितनी बड़ी बड़ी समस्याओं से पंजा लडा रहे हैं और तुम हो कि आ गये कमीज ऊपर उठाये अपना पिचका पेट दिखाने. हम यहाँराज्यों की सरकारें गिराने - बनाने मे लगे हुए है और तुम आ गये मुँह उठाये कि खाना चाहिए.


वहाँ हम कुर्सी के इतनी बडी लड़ाई लड़ रहे हैं और एक तुमहो कि जिन्दगीकी जंग से ही नही निकल पा रहे हो.. लानत है तुम पर.वर्ल्ड वार के बजायघर वार की चिंता मे डूबउतरा रहे हो. तुम क्या अकेले हो,जो बेरोजगार हो? चीन अमेरीका , जापान कहाँनहीं है बेरोजगारी? लन्दन तक की हर दूसरी दुकान किरायेदार के लिए खाली पडी है मुँह बाये हुए.


अरे काम नही है तो काम ढूँढो. सरकार अगर लोगों को काम देने लगी तो खुद क्या काम करेगी? अरे जो वीर पुरूष हैं, उन्हे क्या काम की कमी है? लाख बेरोजगारी है पर करने वालों को काम की कमी है क्या?. आँखखोल कर देखो , पढे लिखे होने का इतना तो उपयोग करो. अनपढ किसानों तक को देखो, कुछ न कुछ करते ही रहते है. कपास गन्ना बोते है और उससे फुर्सतमिलती है तो कर्ज लेने के लिए साहूकारों के चक्कर लगातेहैं. इन सबसे समय़ मिलता है तो सल्फास वगैरह का स्वाद चखते है और आत्म हत्या भी करते रहते हैं.


जिनके दिल मे हिम्मत होती है, वे मन्दी का रोना नही रोते. अकल वाले कैसे भी पैसाबना लेते हैं. मुफत मे मिली किडनी भी हजारों मे सेल करते है. इसलिए बेरोजगारी का रोना मत रो प्यारे क्योंकि रोजगार ढूँढना भी रोजगार है. इसीलिए जोर से लगे रहो.

13 टिप्‍पणियां:

बाल किशन ने कहा…

जबरदस्त व्यंग्य लिखा है आपने व्यवस्था पर. सच्ची तस्वीर पेश कर दी. बहुत अच्छे.

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत जबरद्स्त चोंट की है।अच्छा लगा।

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

उम्दा लिखा है गुरु. मजा आ गया.

अनिल रघुराज ने कहा…

व्यंग्य तो मारक है। लेकिन हकीकत यही है रोजगार ढूंढनेवाले जमकर रोजगार कर रहे हैं. नौकरी डॉट कॉम, जॉब्स डॉट कॉम सभी करोड़ों कमा रहे हैं।

anitakumar ने कहा…

जनाब सौ बार सलाम इस जोरदार व्यंग पर

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

बसंत जी,
क्या बात है, एक बार फिर वेहद सुंदर और सामयिक व्यंग्य हेतु बधाईयाँ!व्यवस्था पर जबरद्स्त चोंट,सचमुच आपने बहुत उम्दा बातें की है, यही सच है,मजा आ गया.

Udan Tashtari ने कहा…

एकदम मारक, बसंत भाई. सालिड व्यंग्य-छा लिये बंधु.

मजा आ गया. बनाये रहो यही लय.

बोधिसत्व ने कहा…

क्या बात है बसंत भाई.....

Gyandutt Pandey ने कहा…

सही है, जिसका दिमाग उर्वर है, वह रोजगार ढ़ूंढ़ने में भी रोजगार ढ़ूंढ़ लेता है। :-)

आशीष कुमार 'अंशु' ने कहा…

बहुत खूब..

Neeraj Goswamy ने कहा…

क्योंकि रोजगार ढूँढना भी रोजगार है.
क्या पंच लाइन लिखी है आपने. बहुत खूब. आप बहुत अच्छा लिखते हैं व्यंग मैं गज़ब की धार है.
आप मेरे ब्लॉग पर आए ग़ज़ल की तारीफ की उसके लिए भी यहीं शुक्रिया अदा कर दूँ क्यों की आप का ई मेल कहीं नज़र नहीं आया
मैंने आप को पहले भी एक मेल भेजी थी आप की पोस्ट पर सोचा था की आप का हूमर का जो टुमर है वो आप से जवाब likhvayega लेकिन निराशा हाथ लगी.
नीरज

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

तम से मुक्ति का पर्व दीपावली आपके पारिवारिक जीवन में शांति , सुख , समृद्धि का सृजन करे ,दीपावली की ढेर सारी बधाईयाँ !

पुनीत ओमर ने कहा…

सच है जी
एक जमाने मे थोड़े दिन के लिए ही सही देखा तो है ये भी