साँवली
यों तो मुहल्ले में कोई भी नई लड़की आये तो लड़कों में दस दिनों तक आहें भरा जाना अनिवार्य है. पर इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ. क्योंकि चम्पा साँवली था और साँवली लड़की में रूचि दिखा कर कोई भी अपनी घटिया पसन्द का प्रदर्शन नहीं करना चाहता था. हाँ, यह बात अलग है कि उसकी अनारो मौसी के साथ सिर्फ मैंने ही चाची का रिश्ता नहीं गाँठ लिया बल्कि पड़ोस के और भी बहुत से लोगों की बुआ , अम्मा , दादी , नानी और ना जाने क्या क्या हो गयी वे.
उसके साँवली होने के कारण अनारो चाची के घर में भी इस बात की चर्चा प्रायः चलती . चम्पा मुझ से कहती- अच्छा बासु, रेखा काली है न? मैं समर्थन में सिर हिला देता तो वह कहती- और रानी मुखर्जी?. मेरे हाँ कहते ही वह दौड़ती हुई सबको ची के पास बुला कर लाती और कहती - देखो, रानी मुखर्जी साँवली है और रेखा तो एकदम काली. फिर भी फिल्मों में काम करती है. पिछली बार ही टी.वी. पर उसकी फिल्म आयी थी. मै तो काली भी नहीं हूँ , साँवली हूँ.
ची कहती - अरे तो क्या तुम्हें कोई फिल्मों में काम करना है. पहले हाथ.....तभी कोई कह देता - रेखा की तो शादी भी नहीं हुई. हुई भी तो.......
फिर चम्पा की आंखों में उदासी के मोती झिलमिलाते . कभी गिर पडते . कभी दिल में अटक कर रह जाते. ची कहती - अरे मेरी बेटी के लिए चाँद सा दूल्हा आयेगाकोई हृदयहीन फिर कह बैठता - चाँद से दूल्हे की अम्मा अपने घर में नौकरानी भी गोरी देख कर रखती है.
फिर कई बरस बीते . मुझे कई जगह अप्लाई कर रिप्लाइ का इंतजार करते - करते दिल्ली में एक नौकरी मिल गई. पर चम्पा को अपनी जिन्दगी के लिफ़ाफ़े पर लिखने के लिए कोई भी पता नहीं मिला. कभी ची झुंझलाती - अरे राम जे भी तो काले थी. किसी ने उनसे कह दिया कि दिल्ली में शहनाज हुसैन रहती है. वह चम्पा को गोरी बना सकती है. वे मेरे पास आई और बोली - बासु बेटा अगली बार दिल्ली से आना तो शहनाज हुसैन से गोरी होने की दवाई लेते आना.दिल्ली जाकर मैंने चम्पा के बारे में बहुत सोचा और एक ही निष्कर्ष पर रूक - रूक गया. बहुत खूबसूरत मगर साँवली सी. मुझे बचपन में खेले गुड्डे गुडियों का खेल स्मृत हो आया और गुड्डे की जगह खुद की कल्पना कर रोमांच .
दिल्ली से वापस आते समय मैं जान बूझ कर गोरे पन की दवाई नहीं लाया.ची बोली - क्यों बासु बेटा , तुम्हें चम्पा की कोई फिक्र नहीं? तुम उसके हाथ पीले नहीं देखना चाहते न?
मैं झिझकते हुए कह बैठा - देखना क्यों नहीं चाहता , मगर इसके लिए उसे गोरी होने की क्या जरूरत है. मुझे तो वह साँवली ही.......सुनते ही ची का मुँह खुशी और आश्चर्य से खुला रह गया पर चम्पा परदे के पीछे शर्म से लाल हो गयी.
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15/7/07
दोस्तो
ठंडे बस्ते से निकाल कर एक लघु कथा लाया हूँ . एक जमाने में लघु कथा का बड़ा हल्ला था. और जिधर देखिए उधर लघु पत्रिकायें निकला करती थी. बन्दे ने भी सम्वाद नाम से एक हिन्दी लघु पत्रिका का सम्पादन और प्रकाशन कुछ साल तक बिहार के सीतामढी जिले से किया था. कुछ लोगों का कहना है कि जो कहानी लिखने का धीरज नहीं रखते वे लघुकथा लिख कर काम चलाते हैं. अहर इस हिसाब से सोचे तो जिसमे महाकाव्य लिखने की योग्यता या धीरज नहीं है वे छोटी छोटी कविताये लिख कर कवि बन जाते है. खैर प्रस्तुत है एक लघुकथा.
भाई-भाई
बारिश हो रही थी और मोहन अपने कमरे में बैठा पढ़ाई कर रहा था. तभी अचानक कुछ लिखने की जरूरत आ पडी . परंतु कलम के लिए हाथ बढाया तो कलम का कुछ अता- पता नहीं. मन मसोस कर बड़बड़ाते हुए उठना पड़ा.’जरूर यह अशोक की शरारत होगी . जब भी पाता है, उठा लेता है.. फिर कमबख्त लिखता भी तो इतना दबाकर है कि बिना नींब टूटे कोई चारा ही नहीं.
बाहर निकला तो देखा वह अंगूठे पर कलम से रोशनाई लगा-लगा कर कागज पर ठप्पा लगाने में मशगूल है. उसे बहुत क्रोध आया. अब तो यह् कलम को कलम नहीं खिलौना समझने लगा है! उसने धीमे से उसके गाल पर एक चपत लगा दी. फिर क्या था. वह रोता हुआ पिताजी के पास पहुंच गया. और शिकायत करने लगा. माँ भी बिगड़ पड़ी. ‘अरे देख तो जरा. बच्चे ने जरा छू ही दिया तो क्या पहाड़ टूट पड़ा जो मार बैठा.. बुलाहट हुई तो जाकर उसने सारी बातें सीधी- सच्ची सुना दी. वे कान खींचते हुए डांटने लगे, ‘ जाओ अभागे , कुत्ते की तरह अपने में ही लड़ कर मर जाओगे . जब भाई -भाई मिल कर नहीं रह सकते तो फिर क्या कर पाओगे.. दूर हो जाओ मेरी नज़रों से.
वह बाहर निकलने लगा तो पुनः बोले , ‘सुनो बारिश बन्द हो चुकी है, मैं एक काम से जा रहा हूँ , तुम शाम को बाजार से सब्जी ले आना.’
माँ बोली , ‘पहले से तो नहीं जाना था. क्या कोई.......’
हाँ जरा मुक़दमे के सम्बन्ध में एक नये वकील से मिलने जा रहा हूँ अब जाकर पता चलेगा राकेश को कि मैंने भी कोई भेड़ बकरी का दूध नहीं पिया है.
बाजार जाते हुए उसके पाँव मन- मन भर के हो रहे थे क्योंकि राकेश उसके छोटे चाचा जी का नाम है और जमीन का कोई मुकदमा है, जिसके लिए पिताजी महीनों से घर पर वकीलों का अड्डा जमा कर गिटपिट करते रहते है.
ठंडे बस्ते से निकाल कर एक लघु कथा लाया हूँ . एक जमाने में लघु कथा का बड़ा हल्ला था. और जिधर देखिए उधर लघु पत्रिकायें निकला करती थी. बन्दे ने भी सम्वाद नाम से एक हिन्दी लघु पत्रिका का सम्पादन और प्रकाशन कुछ साल तक बिहार के सीतामढी जिले से किया था. कुछ लोगों का कहना है कि जो कहानी लिखने का धीरज नहीं रखते वे लघुकथा लिख कर काम चलाते हैं. अहर इस हिसाब से सोचे तो जिसमे महाकाव्य लिखने की योग्यता या धीरज नहीं है वे छोटी छोटी कविताये लिख कर कवि बन जाते है. खैर प्रस्तुत है एक लघुकथा.
भाई-भाई
बारिश हो रही थी और मोहन अपने कमरे में बैठा पढ़ाई कर रहा था. तभी अचानक कुछ लिखने की जरूरत आ पडी . परंतु कलम के लिए हाथ बढाया तो कलम का कुछ अता- पता नहीं. मन मसोस कर बड़बड़ाते हुए उठना पड़ा.’जरूर यह अशोक की शरारत होगी . जब भी पाता है, उठा लेता है.. फिर कमबख्त लिखता भी तो इतना दबाकर है कि बिना नींब टूटे कोई चारा ही नहीं.
बाहर निकला तो देखा वह अंगूठे पर कलम से रोशनाई लगा-लगा कर कागज पर ठप्पा लगाने में मशगूल है. उसे बहुत क्रोध आया. अब तो यह् कलम को कलम नहीं खिलौना समझने लगा है! उसने धीमे से उसके गाल पर एक चपत लगा दी. फिर क्या था. वह रोता हुआ पिताजी के पास पहुंच गया. और शिकायत करने लगा. माँ भी बिगड़ पड़ी. ‘अरे देख तो जरा. बच्चे ने जरा छू ही दिया तो क्या पहाड़ टूट पड़ा जो मार बैठा.. बुलाहट हुई तो जाकर उसने सारी बातें सीधी- सच्ची सुना दी. वे कान खींचते हुए डांटने लगे, ‘ जाओ अभागे , कुत्ते की तरह अपने में ही लड़ कर मर जाओगे . जब भाई -भाई मिल कर नहीं रह सकते तो फिर क्या कर पाओगे.. दूर हो जाओ मेरी नज़रों से.
वह बाहर निकलने लगा तो पुनः बोले , ‘सुनो बारिश बन्द हो चुकी है, मैं एक काम से जा रहा हूँ , तुम शाम को बाजार से सब्जी ले आना.’
माँ बोली , ‘पहले से तो नहीं जाना था. क्या कोई.......’
हाँ जरा मुक़दमे के सम्बन्ध में एक नये वकील से मिलने जा रहा हूँ अब जाकर पता चलेगा राकेश को कि मैंने भी कोई भेड़ बकरी का दूध नहीं पिया है.
बाजार जाते हुए उसके पाँव मन- मन भर के हो रहे थे क्योंकि राकेश उसके छोटे चाचा जी का नाम है और जमीन का कोई मुकदमा है, जिसके लिए पिताजी महीनों से घर पर वकीलों का अड्डा जमा कर गिटपिट करते रहते है.
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