आप डिवाइन इंडिया के चिट्ठाकार दिव्याभ आर्यन से तोपरिचित होंगे. बिहार के रहने वाले है, परहैं जरा सेंटी किस्म के आदमी. आधी उम्र तो बीत चुकी है जनाब की मगर, छोटी छोटी बातों का बुरा मान जाते हैं. जैसे कोई साँवली लड़की काली कह दिये जाने पर कुनमुना जाती है. मतलब अभी चिकने घडे नहीं हुए है अभी कि बिना असर डाले पानी नीचे बह जाये. पिछले दिनो किसी ने मुम्बई की लोकल ट्रेन में एक नया सत्यउनके सामने रख दिया- एक बिहारी सौ बीमारी . बिहारी होने के कारण आहत हो गये. इस देश में तो एक मेढक के टाँगमें चार धागा बांध कर ग्यारह बच्चे खींचते हैं और मजा लेते है
. यही बच्चे बडे तो हो जाते है पर उनकी आदत नहीं जाती. मेढक नहीं मिलता है तो आदमी की टाँग में रस्सी बन्ध कर खींचते है.
मैं दिव्याभ आर्यन से मिला तो नहीं हूँ पर इनके एक छोटे भाई है जिनसे मेरी गहरी दोस्ती है. वे इनकी तरह बरास्ता दिल्ली आइ ए एस बगैरह बनने के प्रयास में टाइम खराब किये बिना सीधे मुम्बई आ गये थे.ये आये हैं फिल्मों, टी वी सीरियलों के डाइरेक्टर बनने पर छोटे भाई साहब का किस्सा अलग है. उनको कालेज केबदमाश और नाकारा ळडकों ने एक दिन् इस लिए खूब् मारा कि प्रिंसिपल की लड़की उस पर क्यों मरती है यह उन्हे लाख कोशिश करने पर भी समझ नहीं आ रहा था. जबकि उस लड़की पर डाइरेक्ट हक उस लडके का बनता था जो प्रिसिपल के मकान में बतौर किराये दार रह रहा था, किराया भी ऎडवांस देता था और शाम को बाजार से सब्जी वगैरह भी लाया करता था. तो गुन्डे लफाडियो से पिटाई खा कर इतने आहत हुए कि सीधे शहर के निकटतम रेल वे स्टेशनपर पहुँचे और यह कसम खाकर कि अब तो कुछ बन कर ही वापस आयेंगे सामने जो भी ट्रेन खडी ठीक उसमे सवार हो गये. साथ में थे कुछ कपडे और ढेर सारी कविताऑ की डायरी और कुछ किताबें. छोटे भाई साहब बेहद सम्वेदनशील हैं किंतु सेंटी बिल्कुल नहीं.मुम्बई आकर बहुत् दिनों तक फुटपाथ पर भटकते रहे और ये सोचते रहे कि इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है. एक मशहूर चित्रकार, जिनकी पेंटिंग करोड़ में बिकती है, उसे जावेद अख्तर के पास ले गये. जावेद जी ने कहा- तुम्हारा सर्टिफ़िकेट तो जरूर् नकली होगा. जरूर चोरी करके पास हुए होगे. पढ़ना लिखना आता है? इस तरह् एक कवि ने एक कवि का मुम्बई में जोरदार स्वागत किया. फिर कोई व्यक्ति उन्हें यू पी के एक बिजनेस मैन के पास ले गये. यू पी वाले ने कहा – बिहार के हो? अरे सारे बिहारी तो चोर हैं. तो छोटे भाई साहब ने एक किस्सा सुनाया- जब मुम्बई आने के क्रम में ट्रेन में लेटे लेटे लखनऊ में उसकी नींद खुली तो उसके कलाई से घडी नदारद थी जो पिताजी ने दसवी की परीक्षा में अव्वल आने पर पिताजी ने दी थी.. तो यूँ तो सारे बिहारी चोर हैं पर छोटे भाई साहब के जीवन की सबसे पहली चोरी लखनऊ में हुई जो बिहार के बाहर है. मुम्बई पहुंचते ही उनका बैग गायब हो गया और स्टेशन के बाहर निकले तो पर्स का पता न था. ये स्टेशन भी बिहार में नहीं था. छोटे भाई साहब को मेरे एक दोस्त ने क्राफर्ड मार्केट में एक सेठ के यहाँ काम दिलाया. छोटे भाई साहब ने तीन चार महीने सेठ के यहाँ काम किया. उनका स्मगलिंग का धन्धा था. जब छोटे भाई सहब को पता लगा तो अपना दो महीने का वेतन छोड कर भाग निकले. बाद में उस सेठ से मुलाकात हुई तो मैने छोटे भाई साहब के वारे में पूछा. सेठ जी बोले- मैं तो पहले ही जानता था . सारे बिहारी चोर हैं. भाग गया.
तो साहब अगर कोई चोर को चोरी न करने दे , या चोरी करने में साथ न दे और रास्ता नाप ले तो चोर बन जाता है.
लालू यादव ने रेलवे को इसी तरह मुनाफे में पहुंचाया है. जितने सुराखो से चोरी हो रहे थी उन सुराखो को बन्द कर दिया. मगर लोग तो बस् यही कहते है. लालू यादव ही नहीं सारे बिहारी चोर है.
इसी साल नवी मुम्बई के नेरूल उपनगर में बसंत पंचमी को सरस्वती पूजा और कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया था. निर्माणाधीन बिहार भवन के प्रांगण में कार्यक्रम था. बिहारी लोगों को जो मिले वही ठगने की कोशिश में रहता है. माइक वाले ने पूरा पेमेंट लेकर भी घटिया साउंड सिस्टम भेजा था . बीच बीच में माईक मायके चला जाता था और कवि गण परेशान हो जाते थे. मंच पर संचालक अनंत श्रीमाली मौजूद थे और साथ में थे दिलदार और हर छे महीने पर कार बदल देने वाले और आज कलस्कोर्पियो में घूम रहेएक मात्र मुम्बईया हिन्दी कवि अरविन्द राही, लाफ्टर चैलेंज और कॉमेडी सर्कस वाले सुनील साँवरा, मुकेश गौतम, राजीव सारस्वत और मैं खुद. माईक बार बार जवाब दे ही रहा था एक बार बिजली भी चली गई. संचालक जी ने कहा – अब जब बिजली भी चली गई तोलग रहा है कि हम वाकई कवि सम्मेलन के लिए बिहार आ गये हैं . लोगों ने खूब मजा लिया जिसमे आधे से ज्यादा बिहारी थे. तो भाई साहब बिहारी होते हैं मजा लेने के लिए. चाहे जैसी भी परिस्थिति हो मजा ले लो. दुःखी मत होओ. मैंने कई सारी कविताओं के पहले वही पर लिखी चार पक्तियाँ वही सुनाई जिसके लिए सारे श्रोताओं ने इतनी देर तक और इतनी जोर कीतालिय़ाँ बजाई जैसी मैने कभी नहीं सुनी थी. आप भी मुलाहिजा फरमाईए.
बिहार सिर्फ राज्य नहीं एक तीर्थ धाम है
बुद्ध महावीर सती सीता का वो ग्राम है
मुश्किलों से दो दो हाथ बिहारियों का काम है
चाणक्य चन्द्रगुप्त भी बिहारियों के नाम है
और घाटे वाली रेलगाडी दे रही मुनाफा अब
क्योंकि वहाँ भी बिहार वाले लालू की लगाम है
अरे एक एक बिहारी यहाँ सैकडों पे भारी है
ऐसे वीर बिहारियों को सौ सौ प्रणाम है.
कुछ लोग इतने सुन्दर होते हैं कि अगर वे सामने हों तो उन्हें देखने में डर लगता है कि कही उन्हें नजर न लग जाये. पिछले दिनों एक ऐसी ही शख्स से मुलाकात हुई, बात हुई, पर अब शेर वही याद आ रहा है तलत अजीज का गाया हुआ- न जी भर के देखा न कुछ बात की, बड़ी आरजू थी मुलाकात की. इस तस्वीर में आप ट्विंकल का दीदार कर रहे हैं और शायद मैं भी वही कर रहा हूँ
बात शुरू करने के लिए कुछ तो वजह चाहिए. यों बात बन्द करने के लिए भी वजह चाहिए. पर बात तो बन्द तब हो जब पहले शुरू हो. तो वजह है एक नज्म और इसे लिखने वाले हैं-ओम प्रकाश आर्य. ये वर्तमान में राजस्थान के अलवर जिले में एक गैर सरकारी संस्थान में कार्यरत है जिसे एन जी ओ कहा जाये तो ज्यादा लोग समझ पाते है और गैर सरकारी संस्थान कहा जाये तो पूछते हैं ये क्या होता है. ओम अति सम्वेदनशील है. अति कोई आतंकित करने के इरादे से नहीं कह रहा हूँ. अति का अर्थ बस इतना भर है कि जितनी सम्वेदनशीलता की जरूरत एक इंसान में होती है उतनी. क्योंकि आजकल सम्वेदनशीलता एक एपेंडिक्स की तरह है. बेकार की चीज. खैर ! कविताय़ें कहें या कहें कि साहित्य से हद दर्जे का अपनापा है. पिछले दिनों मुझे उसने मेल से एक नज्म भेजी तो मुझे लगा आप भी उस नज्म से रू ब रू हों . दरअसल हम दोनों दुनिया के हिसाब से आपस में बहुत ज्यादा बातें नहीं करते पर हम दोनों ही एक दूसरे को बहुत समझते हैं. बुद्ध और महावीर के बारे में कहा जाता है कि वे एक बार मिले. पर दोनों की कुछ बात चीत नहीं हुई. बाद में शिष्यों ने पूछा कि कुछ बात क्यों नहीं की. दोनो महापुरूषों ने अपने अपने शिष्यों से कहा - जो मुझे पता है वो सब उन्हे पता है और जो उन्हे पता है वो सब मुझे पता है. है न गजब की बात. यहाँ एक शेर याद आता है- नजर ने नजर से मुलाकात कर ली रहे दोनों खामोश और बात कर ली इसे बडी प्यारी आवाज के मालिक प्यारे गजल गायक