12/8/07

चूहेदानी




एक चूहे को
मैने चूहेदानी मे पकड़ा
पकडे जाने पर
उसकी छटपटाहट देख
मै भी छटपटा उठा
और चूहेदानी खोल दी
सोंचता हूँ
मैंने चूहे को पकड़ा जरूर
पर आखिर में चूहे ने मुझे पकड लिया


3 टिप्‍पणियां:

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

प्रिय बसंत जी,
चूहा हो या आदमी आज़ादी की खुली हवा में साँस लेना किसको पसंद नहीं. ग़ुलामी की छ्त्पटाहट बड़ी अजीब होती है.

दीपक भारतदीप ने कहा…

बहुत हृदय स्पर्शी रचना हैं
दीपक भारत दीप

vimal verma ने कहा…

आपकी खासियत है आपकी गहराई... आपकी छोटी सी कविता बहुत कुछ कह जाती है..