23/8/07

एक नेताजी, एक श्मशान और उसका उद्घाटन.

केंन्द्र से लेकर ग्राम पंचायत तक, जहाँ भी देखो निर्माण ही निर्माण चल रहा है. लेकिन सारे निर्माण की तब तक कोई महत्ता नही है, जब तक किसी मंत्री जी के हाथों से उसका उद्घाटन न हो जाये. कई महीनों तक मुम्बई मे एक फ्लाई ओवर का उपयोग शान से शहर के आवारा कुत्ते करते रहे पर आदमियों को उसका उपयोग करने की मनाही थी क्योकि उसके उद्घाटन के लिए कोई बड़ा मंत्री नही मिल पा रहा था. मंत्रियों की भी बुरी हालत है. इतने निर्माण , इतने उद्घाटन . कहाँ कहाँ मारे-मारे फिरते रहें.
पर बिना उद्घाटन के निर्माण का महत्व ही क्या है? निर्माण का महत्व तभी है जब कोई बडा नेता शिलान्यास करे, बडे बडे ठेकेदार निर्माण करें और बडे बडे मंत्री उसका उद्घाटन करें . फिर जनता उसका उपयोग करे तो कितना अच्छा लगता है.. पिछले दिनों मुम्बई मे एक अजीब वाकया हुआ. नगरपालिका ने श्मशान घाट का निर्माण करवाया पर उसके उद्घाटन के लिए कोई मंत्री खाली ही नही मिल रहा था. जो खाली रहा होगा, वह राजी नही हुआ होगा . पर चूँकि देश उद्घाटन के बुखार से ग्रस्त है, इसलिए वह भी जरूरी था. तो नगरपालिका वालों ने एक वरिष्ट पुलिस अधिकारी के समक्ष उद्घाटन का प्रस्ताव रखा. पर अधिकारी ने भी इनकार कर दिया. पता नही श्मशान के उद्घाटन की समस्या कैसे हल हुई पर मैने गौर से सोंचा कि श्मशान के उद्घाटन का सही तरीका क्या हो सकता है? एक तरीका तो यह हो सकता है कि उद्घाटनकर्ता खुद् जाकर वहाँ अपनी अंत्येष्टि करवा ले पर इसके लिए शायद ही कोई राजी हो.
दूसरा तरीका यह भी है कि आपके उद्घाटन करने के लिए कोई मुर्दा लाया जाये. उसे आप प्रेम से चिता पर लिटा कर मुखाग्नि प्रदान करें. लेकिन ऐसे मे एक समस्या यह भी है कि सही वक्त पर कोई मुर्दा ही नही मिले. खैर , जो भी हो कितना अच्छा लगता , जब चारों ओर उद्घाटनकर्ता के स्वागत एवं सम्मान मे बडे बडे बैनर लगे हो “ श्री श्री फलाँ फलाँ का हमारे श्मशान मे सहर्ष स्वागत है,” मरने के बाद चाहो भी तो स्वागत के बैनर तो लगने से रहे.
वैसे अब श्मशान या कब्रिस्तान भी हमारे समाज मे पैकेज का हिस्सा बनते जा रहे है. एक बिल्डर ने अपने प्रोजेक्ट की विशेषताओं का बखान विज्ञापन मे इस तरह किया,” बाजार, अस्पताल, स्टेशन , सिनेमा हाळ, पुलिस चौकी और श्मशान पांच मिनट की दूरी पर.” वसे अमरीका वगैरह मे तो कब्रिस्तान की भी जबरदस्त मार्केटिंग होती है. वहाँ कब्रिस्तान भी इस तरह सजे रहते है कि बाहर से गुजरने पर लगता है जैसे अन्दर शादी के मंडप मे कोई नवयुगल को फेर करवा रहा होगा. ऐसे ऐसे सुंदर , डिजाइनदार कब्रिस्तान होते हैं कि सौन्दर्य प्रेमी व्यक्ति हुआ तो वह जानबूझ कर मर जाये.
ऐसे ही एक सजे – धजे रमणीय कब्रिस्तान मे एक बार मै यह सोचकर घुस गया कि अन्दर शायद कोई पार्टी चल रही है. बाहर फूलों , मोमबत्तियों और अन्यान्य चीजों की दुकानें सजाये विक्रय बालायें मुस्कुरा रही थी. मै अन्दर गया तो देखा कि कब्रें भी इस कदर खूबसूरत है कि अपना तो मकान भी उसके आगे कुछ नही. कोई कब्र फूलों से ठकी है तो कोई गुलदस्तों से अटी पडी है. पर आप यह न समझ ले कि इन विदेशियो के मन मे अपने से बिछुडी आत्माओं के लिए बहुत प्यार उमड रहा है. दरसल होता यह है कि जैसे ही मरने के बाद कोई शव कब्रिस्तान मे लाया जाता है कब्रिस्तान का मार्केटिंग विभाग मुर्दे के साथ आये लोगो का अता पता , ईमेल ऐड्रेस आदि ले लेते हैं. फिर हर साल ऐन वक्त से चार दिन पहले उन्हें ई मेल भेज देते हैं.” महोदय, फलाँ फलाँ दिन को आपके चाचा , मामा, पिता या आपकी पूर्व पत्नी की पूण्यतिथि आ रही है. आप अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकालने मे असमर्थ हो अथवा उस दिन अपनी नई गर्लफ्रेंड के साथ डेतिंग पर जा रहे हो तो हम आपकी ओर से उनकी कब्र पर पुष्प गुच्छ चढा देंगे. इसके लिए आपको इतनी राशि का भुगतान करना होगा.”
भला आदमी क्रेडिट कार्ड से इंटरनेट के जरिए पेमेंट कर देता है. कब्र पर फूल चढ जाते हैं. मोमबत्तियाँ जलने लगती है.
मै कब्रिस्तान से बाहर निकल रहा था तो कुछ लोगों ने मुझे घेर लिया और बोले, “ क्या आप अपने बच्चों से प्यार करते हैं?”
अब कौन महामानव होगा जो इसका उत्तर ‘न’ में देगा. मैने जैसे ही हाँ मे सिर हिलाया वे बोले, “ हमारी कम्पनी मे एक स्कीम है. इसके तहत एक छोटी सी राशि का भुगतान आपको हर वर्ष करना है. यह छोटी सी रकम बढकर एक दिन बहुत बडी हो जायेगी.. यह रकम आपके मरने के बाद आपके अंतिम संस्कार के काम आयेगी. अब आप ही सोंचिए आपकी अंत्येष्टि पर आपके बच्चों को कुछ भी खर्च नही करना पडेगा तो उन्हे कितनी खुशी होगी.”
मैने मार्केटिंग की उस महान आत्मा को प्रणाम किया और पूछा कि क्या इस स्कीम का उद्घाटन हो चुका है या मुझसे ही इसका उद्घाटन होना है, तो महान आत्मा ने बताया कि इस स्कीम के उद्घाटन का श्रेय उनके पिताजी को जाता है.
वैसे सही मायने मे उद्घाटन की स्थिति बहुत चिंतनीय है. संगीत के कार्यक्रम का उद्घाटन बहरा व्यक्ति कर्ने आ जाता है. नाई की दुकान का उद्घाटन करने जो नेता आता है वह गंजा होता है. असल मे उद्घाटन का सही तरीका होना चाहिए . जैसे होटल का उद्घाटन करना है तो उद्घाटन कर्ता खाना खाकर और खास कर बिल चुका कर होटल का उद्घाटन करे
नारियल फोडलर और फीता काटकर उद्घाटन करने का अन्दाज कुछ पुराना सा लगता है. वैसे भी ऐन मौके पर नारियल इतना कडा निकलता है कि मंत्री जी के नाजुक हाथों से पटकने पर फूटने का नाम ही नही लेता . कई बार तो कैची इतनी भोथरी होती है कि जवाब नही.
ऐसे मे मुझे एक ऐसे उद्घाटन की याद आ रही है जो वहाँ उपस्थित लोगो को भी बहुत पसन्द आया या. दिल्ली मे एक सुलभ शौचालय का उद्घाटन होना था. उद्घाटन कर्ता ट्रैफिक मे कही फंस गये.
आते आते कई प्राकृतिक आवश्यकतायें उनके धैर्य की परीक्षा ले रहे थी. परिणामस्वरूप वे जैसे ही उद्घाटन स्थल पर पहुचे , आयोजकों को धकियाते हुए एक शौचालय के अन्दर घुस गये. पांच मिनट बाद बाहर निकले तो उनके चेहरे पर असीम शांति थी. लोगों ने पूछा तो उन्होने सहज भाव से कहा कि उन्होने बिल्कुल सही किया है और शौचालय के उद्घाटन का इससे बेहतर तरीका हो ही नही सकता था. अब यह अलग बात है कि जल्दबाजी मे मंत्री महोदय ने महिला शौचालय का उद्घाटन कर दिया.था.
इससे यह बात भी साफ हो गई कि मत्री महोदय को जिस चीज ( उद्घाटन ) का सबसे ज्यादा अनुभव होता है वह काम भी उनसे सही तरीके से नही हो सकता . आपका क्या ख्याल है?

2 टिप्‍पणियां:

Gyandutt Pandey ने कहा…

पूरा लेख पढ़ गये पर पता न चला कि श्मशान का उद्घाटन कैसे होता है. शौचालय का शुभारम्भ आसान है; श्मशान का कठिन.
व्यंगकारों में यही बीमारी है - सब बातों पर व्यंग कर लेंगे - पर समाधान के नाम पर मौन. :)

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

प्रिए बसंत जी,
आपने तो नेता जी से महिला शौचालय का उदघाटन ही करवा दिया, वाह भाई वाह,क्या बात है. वैसे यह कोई नई बात नहीं है हमारे देश के लिए , यहाँ बड़ी आसानी सेबंदर के हाथ नारियल लग जाता है, जो दिखता है वह होता नहीं और जो होता है वह
दिखता नहीं, शमशान तो एक बहाना है , व्यंग्य के मध्यम से जो कहना चाह रहे हैं उसमें आप खरे उतरे हैं.