27/8/07

हमने बेचारे माँ बाप को परिवार से छाँट दिया है

पिछले दिनों
अखबार में ये खबर पढकर
कि मुम्बई के मालाबार हिल इलाके की
एक बहुमंजिली इमारत से कूद कर
दो वृद्ध दम्पत्ति मर गये
मेरे दिल मे उदासी
और आंखों में आंसू भर गये
बहुत देर तक मैं उनके बारे में
सोंचता रहा
और उनकी ही बिल्डिंग के नीचे पडे
उनके मृत देह का दृश्य
मुझे कचोटता रहा
तब मुझे लगा
कि आजकल
हम अपने दायरे में
कुछ इस कदर सिमट गये हैं
कि हमे जन्म देने वाले
माँ बाप से ही हम कट गये हैं
हम दो हमारे दो के इस नारे ने
बस इतना भर किया है
कि परिवार का मतलब
सिर्फ मियाँ बीबी और
बच्चे भर रह गया है
हमने उन दोनो बेचारे माँ बाप को
परिवार से छाँट दिया है
किसी लैंड लाइन का
कनेक्शन समझ कर काट दिया है.
आजकल हर किसी के दिमाग में
यही घर कर रहा है
कि उसका काम तो मोबाईल से चल रहा है
और वो फालतू मे
हर महीने लैंडलाइन का बिल भर रहा है
लेकिन हम ये भूल जाते हैं
कि माँ बाप चाहे कहीं भी रहें
हम पल भर भी
उनके आशीर्वाद के कवरेज एरिया से
बाहर नही जाते हैं
और तो और
अरे ये मोबाईल का कनेक्शन लेते वक्त भी
ये लैंडलाइन ही है
जिनके बिल हमारे काम आते हैं
हम अगर समय पर नहीं चेते
तो अपने किये का नतीजा भुगतेंगे
सिर्फ और सिर्फ पछतायेंगे
उस दिन कुछ भी नही कर पायेंगे
जिस दिन हमारे बच्चे
खुद हमारे नेट वर्क ऐरिया के
बाहर चले जायेंगे.

4 टिप्‍पणियां:

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

यह सोलह आने सच है भाई कि हम सिमटते जा रहे हैं अपने ही दायरे में और भूलते जा रहे हैं
परिभाषा संयुक्त परिवार की...एक शेर मूलहिज़ा फर्माईये-
ज़िंदगी है जंग जीते और हारे ज़िंदगी,
कौन है हमदर्द जिसको अब पुकारे ज़िंदगी?

Mired Mirage ने कहा…

देखिये आजकल के नौजवानों को दोष देना सरल है , पर वस्तु स्थिति समझना भी जरूरी है । औसत उम्र ३२ से बढ़कर ६४ हो गई है । ऐसी भी सन्तानें हैं जो खुद रिटायर हो गई हैं किन्तु जिनके माता पिता उन्हें आज भी बच्चा मानते हैं । ताली एक हाथ से नहीं बजती । हमें दोनों ही पक्षों की समस्याओं को समझना होगा ।
घुघूती बासूती

anitakumar ने कहा…

aapki baat ek dum such hai....ek dooserey per dosh madna bahut asaan hai koi nayi yuva peedhi ka paksh lega toh koi vridh maa baap ka...per asli baat yeh hai ki humaari soch badal gayi hai jaisa aapne kahaa hum do aur humaare doh verna kya maa baap pehle jaise nahi rahe..kya puraane jamaane mein maa baap 50 saal ke bete ko bhi bachcha nahi maante the aur bachcha bhi sir jhuka ker use sneh ke roop mein nahi le leta tha ...hum log soch badal jaane se intolerant ho gaye hain...aur materialism ke chalte swaarthi bhi....bahut sunder poem likhi hai aapne ...badhai

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

बहुत सुन्दर बात कही है आपने। पर यह ऐसी बात है, जिसे जानता तो हर आदमी है पर न जाने क्यों मानने को तैयार नहीं है। फिर भी एक अच्छी कविता के लिए बधाई स्वीकारें।