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16/9/07

एक सपनो का महल हो गर्ल्स होस्टल के सीधे सामने

खिड़कियां

मेहरा साहब उस दिन विमान मे बैठे बैठे किसी फिल्मी पत्रिका मे एक अभिनेता के सपनों के घर के बारे मे पढकर चौंक गये थे. चौंकना स्वाभाविक था, क्योकि वह अपने सपनों का महल किसी सुरम्य वादी या स्वर्ग मे नही बसाना चाहता था. वह तो बस इतना चाहता था कि उसका घर लडकियों के किसी कालेज के होस्टल के सामने हो और उसी मे वह अपनी पूरी जिन्दगी हंसी खुशी गुजार दे.

तब उन्हे ख्याल आया था कि उनका स्वयं का घर भी तो एक ऐसे ही रमणीय स्थल पर है. दिन भर सामने से एक पर एक छप्पन छूरी लोगों के दिलों मे बहत्तर पेंच पैदा करती गुजरती रहती है. फिर दूसरी मंजिल के सबसे पश्चिम वाले कमरे की खिडकी तो होस्टल के शयन कक्ष के ठीक सामने खुलती है.अगर शयन कक्ष की खिडकियाँ भी खुली हो तब तो क्या क्या देखने को नही मिलता है. और हाय! गर्मियों मे तो मेहरा साहब कई कई रातें जागकर गुजार किया करते थे. लडकियाँ ठंडी हवा के लिए खिडकी खुली छोड कर सोती थी और भूले से अगर परदा भी नही खिंचा होता तो रात को उनके शरारती कपडे कहाँ कहाँ से फिसल जाते कि तौबा तौबा.

वैसे मेहरा साहब तो समय के साथ साथ बूढे होते चले गये, पर लडकियाँ कभी बूढी नही हुई. हर साल नई-नई और खूबसूरत लडकियाँ आ जाती. उनके जमाने मे तो इतनी लाजवाब लडकियाँ होती भी नही थी, खैर..... अब तो सदा व्यापार के सिलसिले मे बाहर रहना होता है , तो भला ऐसे मौके कहाँ? लेकिन अचानक उन्हे अपने दोनों बेटों की याद आई, वे? वे तो.........?

वे उसी शाम उस कमरे मे गये. शयन कक्ष की खिडकियाँ पूर्ववत खुली थी. उन्होने गौर से देखा, कोई लडकी अपने कपडे बदल रही थी. उन्होने शर्म से आंखे बन्द कर ली.

उसी क्षण उन्होने यह भी निश्चय कर लिया कि उन्हे छात्रावास के वार्डन से मिलना चाहिए.

दूसरी ही सुबह पहुंच भी गये और कहने लगे,”समझ मे नही आता आपके यहाँ की लडकियाँ कितनी बेशरम है? अन्धे तक को भी दिखाई पडता है कि पहाड जैसा मकान सामने खडा है , फिर भी कमरे की खिडकियाँ होले यो कपडे बदलती रहती है कि...........बेशरम.”

युवा वार्डन घडी भर को चुप रही. फिर बोली,” अरे, मेहरा साहब, लडकियाँ तो लडकियाँ ! नादान है, भोली है, यों तो परदे खींच ही देती होंगी, पर उम्र ही ऐसी है कि दुपट्टा भी सम्भाले नही सम्भलता है. फिर खिडकी तो खिडकी है. और फिर अगर आपको इनकी शर्म का इतना ख्याल है तो आप अपनी खिडकी बन्द करके भी तो उन्हे बेशरम होने से बचा सकते हैं”

मेहरा साहब के पास अब कोई जवाब नही था.

27/8/07

रानी मुखर्जी साँवली है और रेखा तो एकदम काली

साँवली

यों तो मुहल्ले में कोई भी नई लड़की आये तो लड़कों में दस दिनों तक आहें भरा जाना अनिवार्य है. पर इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ. क्योंकि चम्पा साँवली था और साँवली लड़की में रूचि दिखा कर कोई भी अपनी घटिया पसन्द का प्रदर्शन नहीं करना चाहता था. हाँ, यह बात अलग है कि उसकी अनारो मौसी के साथ सिर्फ मैंने ही चाची का रिश्ता नहीं गाँठ लिया बल्कि पड़ोस के और भी बहुत से लोगों की बुआ , अम्मा , दादी , नानी और ना जाने क्या क्या हो गयी वे.
उसके साँवली होने के कारण अनारो चाची के घर में भी इस बात की चर्चा प्रायः चलती . चम्पा मुझ से कहती- अच्छा बासु, रेखा काली है न? मैं समर्थन में सिर हिला देता तो वह कहती- और रानी मुखर्जी?. मेरे हाँ कहते ही वह दौड़ती हुई सबको ची के पास बुला कर लाती और कहती - देखो, रानी मुखर्जी साँवली है और रेखा तो एकदम काली. फिर भी फिल्मों में काम करती है. पिछली बार ही टी.वी. पर उसकी फिल्म आयी थी. मै तो काली भी नहीं हूँ , साँवली हूँ.
ची कहती - अरे तो क्या तुम्हें कोई फिल्मों में काम करना है. पहले हाथ.....तभी कोई कह देता - रेखा की तो शादी भी नहीं हुई. हुई भी तो.......
फिर चम्पा की आंखों में उदासी के मोती झिलमिलाते . कभी गिर पडते . कभी दिल में अटक कर रह जाते. ची कहती - अरे मेरी बेटी के लिए चाँद सा दूल्हा आयेगाकोई हृदयहीन फिर कह बैठता - चाँद से दूल्हे की अम्मा अपने घर में नौकरानी भी गोरी देख कर रखती है.
फिर कई बरस बीते . मुझे कई जगह अप्लाई कर रिप्लाइ का इंतजार करते - करते दिल्ली में एक नौकरी मिल गई. पर चम्पा को अपनी जिन्दगी के लिफ़ाफ़े पर लिखने के लिए कोई भी पता नहीं मिला. कभी ची झुंझलाती - अरे राम जे भी तो काले थी. किसी ने उनसे कह दिया कि दिल्ली में शहनाज हुसैन रहती है. वह चम्पा को गोरी बना सकती है. वे मेरे पास आई और बोली - बासु बेटा अगली बार दिल्ली से आना तो शहनाज हुसैन से गोरी होने की दवाई लेते आना.दिल्ली जाकर मैंने चम्पा के बारे में बहुत सोचा और एक ही निष्कर्ष पर रूक - रूक गया. बहुत खूबसूरत मगर साँवली सी. मुझे बचपन में खेले गुड्डे गुडियों का खेल स्मृत हो आया और गुड्डे की जगह खुद की कल्पना कर रोमांच .
दिल्ली से वापस आते समय मैं जान बूझ कर गोरे पन की दवाई नहीं लाया.ची बोली - क्यों बासु बेटा , तुम्हें चम्पा की कोई फिक्र नहीं? तुम उसके हाथ पीले नहीं देखना चाहते न?
मैं झिझकते हुए कह बैठा - देखना क्यों नहीं चाहता , मगर इसके लिए उसे गोरी होने की क्या जरूरत है. मुझे तो वह साँवली ही.......सुनते ही ची का मुँह खुशी और आश्चर्य से खुला रह गया पर चम्पा परदे के पीछे शर्म से लाल हो गयी.

6/8/07

एक लघुकथा में एक बड़ी कहानी

अंतिम इच्छा
जब तक उसकी बांहों में बल रहा , उसने मेहनत मशक्कत करने से कभी जी नहीं चुराया और हमेशा अपने दोनों बेटों की नाजो नेमत में लगा रहा. लेकिन जब उसी जवानी के जोश में बुढ़ापे का जंग लगना आरंभ हुआ तो बेटों को भी अंगूठा हीन एकलव्य् सदृश मां बाप की उपस्थिति दूध में पड़ी मक्खी की तरह खलने लगी. बूढ़े की आँखों में धूल झोंक कर जमीन जायदाद अपने हाथों में कर ली. दोनों भाईयों के आधे आधे हिस्से भी बंट गये. वृद्ध माँ बाप को खर्च भी दोनों ने आधा आधा बांट लिया. मगर पके आम सी जिस वय में प्यार की आवश्यकता पहले है पैसा साथ भी दे सकता है तो कहाँ तक ? एक दिन बूढ़ा कही जा रहा था. धूप की मार बरदाश्त नहीं हुई और चलते चलते ही.........
इधर शाम हो गयी पर बूढ़ा नहीं आया तो बुढ़िया की व्याकुलता बढ़ने लगी . बेटों को खोज खबर लेने को कहा तो जवाब मिला कि कोई दूध पीते बच्ची थोड़े ही है जो खोजने जायें. मगर जब संतोष नहीं हुआ , तो स्वयं निकल पड़ी. भीड़ देखकर एक जगह पता करना चाहा तो हैरान रह गयी. बूढ़ा मरा पड़ा था ”किसी ने गला घोंट दिया है.” ”हमें तो लगे है शराबी. नशा में है.” ”नहीं मर चुका है जी.”
जैसे लोग वैसी बदी. बुढ़िया से रहा न गया. ‘आप लोग परेशान मत होईए. ये मेरे पति हैं’ लोग सहानुभूति जताने लगे.’क्या दुर्गति हो गयी भले मानस की, बूढी माँ तेरा कोई बेटा नहीं है. क्रिया कर्म की व्यवस्था करो.’
तभी कही से दोनों बेटे भी आ गये. पर हाय! कोई कफन खरीदने को भी तैयार नहीं. एक अपनी खाली जेब की दुहाई दे रहा है तो दूसरा उसका भी काँच काटता है. ‘मरे पर खर्च करने को जरूरत क्या है?’
काफी चाय चूँ के बाद दोनो में समझौता हुआ तो जाकर कफन की व्यवस्था हुई. दो अन्य लोगों ने मिलकर कन्धा दे दिया. श्मशान पहुंच कर बाकी कार्य भी ठीक ढंग से सम्पन्न हो गया. लोगों के वापस लौटने का वक्त भी आ गया. पर बुढ़िया वैसे ही चिता की और निर् निमेष ताक रही थी. बेटों ने देखा तो झकझोर कर जगाया. “माँ...” बेटों को देख बुढिया के आगे फिर एक बार चौराहे की घटना एक एक कर नाच गयी.. उसके जी में आया वह उसे जोर जोर से गालियां देने लगे. ‘ कफनचोर कहीं के नहीं जाना तुम्हारे साथ.’
बेटों का सब्र टूटा, “बोलती क्यों नहीं माँ? चलो न घर को.”
वह बोलती हुई काँप गयी,”बेटा, अब एक ही आकांक्षा है . पैरों के बल श्मशान आ गयी हूँ तो नहीं चाहती चार लोगों के कंधे को फिर कष्ट हो बस.” बेटों के पास कोई जवाब नहीं था. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि अब वे क्या कहें.