5/7/07

कुछ तो वजह चाहिए

//static.flickr.com/1407/774310303_9313b310d8_sबात शुरू करने के लिए कुछ तो वजह चाहिए. यों बात बन्द करने के लिए भी वजह चाहिए. पर बात तो बन्द तब हो जब पहले शुरू हो. तो वजह है एक नज्म और इसे लिखने वाले हैं-ओम प्रकाश आर्य. ये वर्तमान में राजस्थान के अलवर जिले में एक गैर सरकारी संस्थान में कार्यरत है जिसे एन जी ओ कहा जाये तो ज्यादा लोग समझ पाते है और गैर सरकारी संस्थान कहा जाये तो पूछते हैं ये क्या होता है. ओम अति सम्वेदनशील है. अति कोई आतंकित करने के इरादे से नहीं कह रहा हूँ. अति का अर्थ बस इतना भर है कि जितनी सम्वेदनशीलता की जरूरत एक इंसान में होती है उतनी. क्योंकि आजकल सम्वेदनशीलता एक एपेंडिक्स की तरह है. बेकार की चीज. खैर ! कविताय़ें कहें या कहें कि साहित्य से हद दर्जे का अपनापा है. पिछले दिनों मुझे उसने मेल से एक नज्म भेजी तो मुझे लगा आप भी उस नज्म से रू ब रू हों . दरअसल हम दोनों दुनिया के हिसाब से आपस में बहुत ज्यादा बातें नहीं करते पर हम दोनों ही एक दूसरे को बहुत समझते हैं. बुद्ध और महावीर के बारे में कहा जाता है कि वे एक बार मिले. पर दोनों की कुछ बात चीत नहीं हुई. बाद में शिष्यों ने पूछा कि कुछ बात क्यों नहीं की. दोनो महापुरूषों ने अपने अपने शिष्यों से कहा - जो मुझे पता है वो सब उन्हे पता है और जो उन्हे पता है वो सब मुझे पता है. है न गजब की बात. यहाँ एक शेर याद आता है- नजर ने नजर से मुलाकात कर ली रहे दोनों खामोश और बात कर ली इसे बडी प्यारी आवाज के मालिक प्यारे गजल गायक भूपिन्दर और मिताली सिह ने खूबसूरत अन्दाज में गाया है. कुछ ऐसा ही होता है अकसर चलिए वह नज्म मुलाहिजा कीजिए-और पसन्द आये या आप कुछ कहना चाहें तो सीधे उसे भी मेल कर सकते हैं बस यहाँ क्लिक कीजिए नज्म -ओम प्रकाश आर्य पतझर में जो पत्ते बिछड़ जाते हैं अपने आशियाने से, वे पत्ते जाने कहाँ चले जाते हैं उन सूखे पत्तों की रूहें उसी आशियाने की दीवारों पे सीलन की तरह बहती रहती है किसी भी मौसम में ये दीवारें सूखती नहीं ये नम बनी रहती है मौसम रिश्तों की रूहों को सुखा नहीं सकते. 43 Things Tags: हाँ ये बताना रह ही गया कि ये मेरे छोटे भाई हैं.

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