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20/11/07

त्वरित टिप्पणियों की टकसाल: हिन्दी कवि सम्मेलन

टिप्पणियों के बेताज बादशाह: श्याम ज्वालामुखी

ब्लाग पर टिप्पणियाँ देने का चलन आम है. मेरी जानकारी में हिन्दी ब्लाग पर टिप्पणियाँ देने मे उड़न तश्तरी वाले कनाडियन भारतीय समीर लाल जी का कोई तोड़ नहीं है. ब्लागर दोस्तों से टिप्पणियों के सन्दर्भ में बात चीत हो तो कई तो अक्सर ये सोंचते दिखते हैं कि समीर जी ने कोई बन्दा रखा हुआ है जो उनकी ओर से तुरत टिप्पणियाँ पोस्ट करता रहता है वर्ना सभी ब्लाग पर समीर जी की पहली टिप्पणी का जादू समझ के बाहर है. लोग समझ नहीं पाते हैं कि समीर जी अगर दिन रात ब्लाग पढते और टिप्पणियाँ ही करते रहते हैं तो वे बाकी काम कब करते होंगे.पर मेरा मानना है कि महान लोगों के काम करने का ढंग भी जुदा होता है. मुझे एक शेर याद आता है

कोई चार दिन की जिन्दगी मे सौ काम करता है
किसी की सौ बरस के जिन्दगी में कुछ नही होता.

मेरी समझ से यही समीर भाई का राज है.

बहरहाल मैं हिन्दी कवि सम्मेलनों की बात करना चाह रहा था. कवि सम्मेलन मे कविता तो महत्वपूर्ण होती ही है. पर श्रोताओं का प्रतिसाद जिस एक चीज पर सबसे ज्यादा मिलती है वह है कवि या संचालक द्वारा कवि सम्मेलन के दौरान के गई त्वरित टिप्पणियाँ.
त्वरित टिप्पणियाँ देने में कई मंचीय हिन्दी कवियों का कोई जवाब नहीं है. वर्तमान में सत्य नारायण सत्तन ,
अशोक चक्रधर , सुभाष काबरा ,अरुण जैमिनी ,कुमार विश्वास, किरण जोशी , सुनील जोगी आदि हिन्दी मंच के उन विरल विभूतियों में से हैं जो घटित हो रही घटनाओं पर अपनी त्वरित टिप्पणियों से श्रोता समूह पर एक जादू सा करते हैं और उन्हें आह्लादित कर देते हैं। स्वर्गीय श्याम तो इसके मास्टर ब्लास्टर थे और टिप्पणियों की वो बारिश करते थे कि लोग गिनती ही नही सुध बुध सब भूल जाते थे.

एक बारमेरी शादी हुई
किसी कवि का एक जुमला जिसे देश के कई कवि ले उड़े वो है”’एक बार’ मेरी शादी हुई” इस जुमले में ‘एक बार’ का जवाब नहीं है. श्रोता बरबस पूछ बैठते हैं –एक बार? और कवि कहता है – जी हाँ आप लोगों की कृपा से अभी तक एक बार ही हुई है.

माइक वाले को एडवांस में पेमेंट
अकसर कवि सम्मेलन मे माइक सिस्टम खराब हो जाता है. ऐसी स्थिति मे एक जुमला लोगों को बहुत गुदगुदाता है. कवि कहता है- लगता है आयोजकों ने माइक वाले को एडवांस में पेमेंट कर दिया है. श्रोताओं क यह टिप्पणी अनायास ही गुदगुदा देती है.

माईक पर गणेश जी खड़े हैं
दिल्ली के अरुण जैमिनी ग्वालियर निवासी प्रदीप चौबे के स्थूल शरीर पर छींटाकसी करते हुए अकसर कहते हैं- ऐसा लग रहा है माएक पर गणेश जी खडे हैं और प्रदीप चौबे आनन फानन अरूण जमिनी को लक्षित करते हुए कहते हैं – बड़े माईक पर गणेश जी खड़े हैं और छोटी माइक पर उनकी सवारी मौजूद है. इस पर श्रोता अनायास खिलखिला उठता है.

कविता वोई और कवि कोई
कवि सम्मेलन की वर्तमान अराजकता पर जिसमें जिसको मौका मिले जिसकी भी कविता हो बिना नाम तक लिए कवि पढ देता है तालियाँ लूट कर ले जात है टिप्पणी करते हुए व्यक्तिगत बातचीत मे श्याम ज्वालामुखी कहा करते थे. पहले के जमाने मे कवि सम्मेलन में वोई कवि और वोई कविता हुआ करती थी और अब कविता वोई और कवि कोई.

बिहारी आदमी की ताकत
पिछले दिनों माँ सरस्वती की कृपा से एक ऐसी ही टिप्पणी मेरे मुँह से भी निकली. हुआ यों के दादर में एक कवि सम्मेलन था. युगराज जैन बतौर संचालक निमंत्रित थे. कवि गण थे- महेश दूबे, सुरेश मिश्रा, अनिल मिश्र, मोतीलाल श्रीवास्तव, शिखा पांडेय और मैं खुद. युगराज भाई ट्रैफिक में कहीं फंसे हुए थे और आयोजक कार्यक्रम शुरू करने को आमादा हो रहे थे. आखिरकार सुरेश मिश्र ने कार्यक्रम का संचालन शुरू किया और मोतीलालजी को काव्यपाठ के लिए खड़ा कर दिया. उनके काव्यपाठ के उपरांत मुझे खड़ा करने से पहले मेरे राज्य बिहार की काफी ‘तारीफ’ की और यहाँ तक कहा कि जो तालियाँ नहीं बजायेगा उस श्रोता का अगला जन्म भी बिहार में होगा. पर इसी बीच मूल संचालक युगराज जैन पधार चुके थे. सुरेश मिश्रा ने युगराज जी को मंच पर बुलाया और संचालन का भार उन्हे सौपते हुए खुद कवियों के बीच स्थापित हो गये. सामने श्रोताओं के बीच महाराष्ट्र के पूर्व गृह राज्य मंत्री कृपा शंकर सिंह और वरिष्ट पत्रकार नन्द किशोर नौटियाल भी मौजूद थे. मैं माईक पर आया और पहला ही वाक्य मेरी कंढ से फूटा- आपको बिहारी आदमी की ताकत का अन्दाजा इसी से हो गया होगा कि उसके आने से पहले ही आदमी अपनी गद्दी छोड कर दूसरे को सौंप देता है. श्रोताओं की वह हंसी और उनके हाथ की वो तालियाँ .अहा हा क्या बताउँ ? मैं देर तक उस नशे मे रहा.

2/11/07

रोजगार ढूंढना भी एक रोजगार है

आजकल बेरोजगारीका यह आलम है कि रोजगार दफ्तर भी अब बेरोजगार पडॆ हैं . बल्कि लेटे - लेटेकराह रहे हैं. पहले एक - आध बेरोजगार कहीं से घूमता - भटकता दफ्तर मे आ जाता था कि मुझे रोजगार दो. तो दफ्तर वाले उसे समझाते थे कि फलाँ फार्म भर दो, ढिकाँ जगह जमा करा दो. फिर जब तुम्हे खबर देंगे तो वहाँ जाकर ज्वायन कर लेना . पर धीरे - धीरेलोगो को पता लग गया कि फलाँ फार्म भरकर ढिकाँ जगह जमा कर देने भर से कुछ होना जाना नही है तो लोगो ने उस मन्दिर की राह जाकर सिर पटकना बन्द कर दिया.


बड़े बूढे कहते हैं पहले रोजगारदफ्तर वाले गली - गलीघूमते थेऔर ढूँढते रहते थे कि किसे रोजगार दिया जाये ? कोई जरा सा योग्य मानुस दिखा नहीं कि उसे पकड़ कर बिठा देते थे कि भैयायहाँनौकरी करनी पड़ेगीऔर आदमी मजबूरी मे काम करने लगता था. पर अब वो दिन हवा हुए और नौकरी देने वाले पकड़ पकड़ करलोगों को स्वैच्छिक अवकाश पर जाने के लिए मना रहे हैं. और जो नहीं मान रहे उन्हें धक्के देकर बाहर कर रहे हैं. जो लोग कम्प्यूटर बाबा की लाठी टेकते हुए जर्मनी और अमेरीका एक्स्पोर्ट हो गये थे , वे भी वापस आकर देश मे चौथाई तनखाह पर रोजगार तलाश रहे हैं


देश के प्रधान मंत्री ने किसी दिन एक फाइव स्टार रिसोर्ट मे बैढकर चिंतन कियातो बेरोजगारी की हालतदेखकरवे द्रवित हो गये .जी मे तो आया कि फटाफ़ट पूर्व प्रधान मंत्रियों की तर्ज पर दो - चार कवितायें लिख डालें . पर कुछ सोच कर रह गये और सीधे यही घोषणाकर दी कि सरकार एक करोड़ लोगो को रोजगार देगी. बाद मे लोगो ने पूछा कि सरकार के उस वायदे का क्या हुआ? इस बात पर सरकार भन्ना गई. उसका भन्नाना भे स्वाभाविक है. अब अकेली सरकार क्या क्या करे बेचारी.


वह नदियों को आपस मे जोडे या लोगों को. वह समन्दर के अन्दर सेतु की रक्षा करे या अपनी. वह बैंकों की ब्याज दर घटाने मे समय लगाये या बेरोजगारी घटाये. वह अयोध्या मे मन्दिरबनाये. ये आपके भुक्खड पेट की आग बुझाये. वह करोड पति क्रिकेट खिलाडियों को टैक्स मे रियायत दे या पिद्दी जनता की कोटरो मे धंसी आँखे निहारे. अब समस्याओं पर समस्यायेंहै . पाकिस्तान है . कश्मीर है. बाँगला देशी है. नये राज्यो की डिमांड है.परमाणु समझौते हैं.


गजब के हो तुम भी. यहाँ हम कितनी बड़ी बड़ी समस्याओं से पंजा लडा रहे हैं और तुम हो कि आ गये कमीज ऊपर उठाये अपना पिचका पेट दिखाने. हम यहाँराज्यों की सरकारें गिराने - बनाने मे लगे हुए है और तुम आ गये मुँह उठाये कि खाना चाहिए.


वहाँ हम कुर्सी के इतनी बडी लड़ाई लड़ रहे हैं और एक तुमहो कि जिन्दगीकी जंग से ही नही निकल पा रहे हो.. लानत है तुम पर.वर्ल्ड वार के बजायघर वार की चिंता मे डूबउतरा रहे हो. तुम क्या अकेले हो,जो बेरोजगार हो? चीन अमेरीका , जापान कहाँनहीं है बेरोजगारी? लन्दन तक की हर दूसरी दुकान किरायेदार के लिए खाली पडी है मुँह बाये हुए.


अरे काम नही है तो काम ढूँढो. सरकार अगर लोगों को काम देने लगी तो खुद क्या काम करेगी? अरे जो वीर पुरूष हैं, उन्हे क्या काम की कमी है? लाख बेरोजगारी है पर करने वालों को काम की कमी है क्या?. आँखखोल कर देखो , पढे लिखे होने का इतना तो उपयोग करो. अनपढ किसानों तक को देखो, कुछ न कुछ करते ही रहते है. कपास गन्ना बोते है और उससे फुर्सतमिलती है तो कर्ज लेने के लिए साहूकारों के चक्कर लगातेहैं. इन सबसे समय़ मिलता है तो सल्फास वगैरह का स्वाद चखते है और आत्म हत्या भी करते रहते हैं.


जिनके दिल मे हिम्मत होती है, वे मन्दी का रोना नही रोते. अकल वाले कैसे भी पैसाबना लेते हैं. मुफत मे मिली किडनी भी हजारों मे सेल करते है. इसलिए बेरोजगारी का रोना मत रो प्यारे क्योंकि रोजगार ढूँढना भी रोजगार है. इसीलिए जोर से लगे रहो.

16/10/07

किस्सा प्याज और अपनी लुटी हुई लाज का


पत्नी बोली- तुम क्या कमाते हो

असल में तो पडोस का शर्मा कमाता है

उसके बीवी रोज

एक किलो प्याज खरीदती है

और सारा परिवार खाता है

तुमसे तो कुछ लाने को बोलूँ

तो आंखें लाल पीली होने लगती है

और प्याज के नाम पर

पतलून ढीली होने लगती है.

मैने कहा- फिजूल के खर्चे मत किया कर

और प्याज के ज्यादा चर्चे मत किया कर

ये चीज ही ऐसी धांसू है

कि पहले तो खाते वक्त आती थी

अब भाव सुन कर ही आंखों में आंसू है

क्या बताउँ दफ्तर मे चपरासी तक

बास के साथ लंच खाता है

क्योंकि अपनी टिफिन से निकाल कर

प्याज तो वही खिलाता है

अब तो लगता है

दूल्हा दहेज मे प्याज ही मांगेगा

और गले में नोटों की जगह

प्याज की माला टांगेगा

लडकी का पिता लडके के आगे

सिर के पगडी के बजाय

प्याज ही रखेगा

और मेरी लाज रख लीजिए के बजाय कहेगा

जी मेरा प्याज रख लीजिए

सास बहू को ताना मारेगी

अरे वो तो किस्मत ही खराब थी

जो यहाँ पे रिश्ता किया

वर्ना हमने तो अच्छे अच्छे प्याज वाले को

घर मे घुसने तक नही दिया

बडे बडे नेता खुद को

सिक्कों के बजाय प्याज से तुलवायेंगे

और अच्छे अच्छे कवि

प्याज पर कवितायें सुनायेंगे.

राजनीतिक पार्टियाँ अपना चुनाव चिह्न

प्याज रखेगी

और घर घर जाकर

प्याज बांटने वाली पार्टी ही

सत्ता का स्वाद चखेगी.

क्योकि प्याज की मारी जनता कहेगी

न हमे राम राज चाहिए

न कृष्ण राज चाहिए

हमे तो सिर्फ सस्ता प्याज चाहिए.

30/8/07

आज ना छोड़ेंगे

आज ना छोड़ेंगे



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बाये से है. राकेश जोशी, देवमणि पांडेय ,यूनूस खान्, देवमणि पांडेय, महेश दूबे, महेन्द्र मोदी, बसंत आर्य,वीनू महेन्द्र और बैठी है कांचनप्रकाश और कुसुम जोशी.


मौका होली का था.और साल 2007. होलीके लिए विशेष प्रोग्राम की कल्पना की थी विविध भारती मुम्बई के केंन्द्र् निदेशकमहेन्द्र मोदी जी ने और जोश था राकेश जोशी जी का. जब होली में सब यही कहते हैं किआज ना छोड़ेंगे तो भला रेडियो वाले कवियों को कैसे छोड़ सकते थे. रिकार्डिंग के लिएबुलाया गया मुम्बई के ही छै कवियों को. कवि गण थे बहुत भारी इसीलिए सोच समझ कर दीगई थी कार्यक्रम के संचालन की जिम्मेदारी . और वो दी गई देवमणि पांडेय को. कवि गणथे- सर्दी खाँसी न मलेरिया हुआ से प्रसिद्धि पाने वाले वीनू महेन्द्र, बनारस केलोटे की तरह मुम्बई में मौजूद सभी कवियों में मोटे महेश दूबे साहब. जिन्हे उनकेगोरेगाँव् फर्निचर से उठवाया गया था, जहाँ दिन भर बैठ कर वे भगवान का मन्दिर बेचाकरते हैं. जब ग्राहक दुकान में नहीं होते उस वक्त वे कविताये लिखते रहते हैं अगरकविताय़ें भी नहीं लिखना हो पाता तो वे बाल ठाकरें जी के हिन्दी अख़बार दोपहर कासामनाके पाठकों के सवालों से रू ब रू होते हैं और डाईरेक्ट ऐक्शनलेते है जो किउनके कॉलम का नाम है. इस बात से उनकी प्रसिद्धि और बढी है कि वे अब बाल ठाकरे केबाद दूसरे शख्स हैं जो डाएरेक्ट ऐकशन लेते है.. उन्हें ज्यादा कमाई कविता से होतीहै या दुकान से ये मुम्बई के सारे हास्य कवियों की उत्सुकता का विषय है. अम्बरनाथसे दौड़े हुए आये थे दिनेश बाबरा जिसके बारे में मुम्बई के कवियों का ये मानना है किपाँच फिट के उसके शरीर में हर अंग में दिमाग है और इंतना ज्यादा दिमाग होने केबावजूद वो बददिमाग़ नहीं है. विनम्र बहुत है और सबसे झुक कर मिलता है और मिलकर तनतानहीं है. इसीलिए लोग कहते हैं कि बहुत जल्द वो कॉलेज की नौकरी छोड़ेगा और मुम्बई मेंफ्लैट बुक करा कर आराम से कविताई करेगा. एक कवि मैं स्वयं था - बसंत आर्य. एककवयित्री भी थी- कुसुम जोशी. ये कई जगहों पर अपनी टाँग फँसाये रखती हैं . सीरियलबनाती हैं. ऐड फिल्म बनाती हैं और हर रस की कवितायें करती हैं. गाती तो अच्छा हैही. वे इंतनी अच्छी दिखती हैं तो खुद अभिनय क्यों नहीं करती ये लोगों के लिएआश्चर्य का विषय है. आज ही उन्हे उनके लड़के ने नया नया मोबाईल दिया था जिसे कैसेओपरेट करना है ये प्रोग्राम के संचालक महोदय उन्हे सिखा रहे थे. नम्बर कैसे रिडायलकिया जाता है ये सीखने के बाद कुसुम जी ने कहा- आज के लिए बस इतना काफी है तो यूनूसखान ने कहा आज न छोड़ेंगे. विविध भारती के दो कॉम्पेयर_ यूनूस खान( अजी अपने वही ब्लाँगर रेडियोवाणीवाले.क्या आवाज है हुजूर की. जी करता है न कि सुनते रहें) जो यूथ्एक्स्प्रेशलेकर युवाओं में लोकप्रिय हैं और सखी सहेलीजिसे लेकर कांचन प्रकाशयुवतियों में चरचा का विषय बनी रहती है- की उर्जा को देख कर सारे कवि दंग थे. कांचनजी का चुलबुलापन अपने चरम पर था. कार्यक्रम की रिकार्डिंग में सभी कवि मजा लेते रहेक्योंकि ये मंच से हट कर एक अलग अनुभव था. बीच में हास्य कवियों के पितामह काकाहाथरसी की कुछ रिकार्डिंग सुन कर कवि धन्य हुए . वीरेन्द्र तरून जी के फाग छन्द सुनकर हम भी धन्य हुए. कार्यक्रम का प्रसारण हुआ 4.3.2007 को दिन में 3 बजे से पाँचबजे के दौरान. चिट्ठियाँ और फोन कॉल आये सिर्फ उन लोगों के जिन्हे हमलोगों ने फोन कर कर के कहा था कि जरूर सुनना ये प्रोग्राम क्योंकि इस टीवी के जमाने में रेडियो सुनता कौन है. और जो सुनते हैं उनके पास फोन नहीं है. सो न उन्हें मैने सुनने के लिए कहा और न ही सुनने के बाद उन्होने कहा कि उन्होने सुना. सुन रहे हैं न!



23/8/07

एक नेताजी, एक श्मशान और उसका उद्घाटन.

केंन्द्र से लेकर ग्राम पंचायत तक, जहाँ भी देखो निर्माण ही निर्माण चल रहा है. लेकिन सारे निर्माण की तब तक कोई महत्ता नही है, जब तक किसी मंत्री जी के हाथों से उसका उद्घाटन न हो जाये. कई महीनों तक मुम्बई मे एक फ्लाई ओवर का उपयोग शान से शहर के आवारा कुत्ते करते रहे पर आदमियों को उसका उपयोग करने की मनाही थी क्योकि उसके उद्घाटन के लिए कोई बड़ा मंत्री नही मिल पा रहा था. मंत्रियों की भी बुरी हालत है. इतने निर्माण , इतने उद्घाटन . कहाँ कहाँ मारे-मारे फिरते रहें.
पर बिना उद्घाटन के निर्माण का महत्व ही क्या है? निर्माण का महत्व तभी है जब कोई बडा नेता शिलान्यास करे, बडे बडे ठेकेदार निर्माण करें और बडे बडे मंत्री उसका उद्घाटन करें . फिर जनता उसका उपयोग करे तो कितना अच्छा लगता है.. पिछले दिनों मुम्बई मे एक अजीब वाकया हुआ. नगरपालिका ने श्मशान घाट का निर्माण करवाया पर उसके उद्घाटन के लिए कोई मंत्री खाली ही नही मिल रहा था. जो खाली रहा होगा, वह राजी नही हुआ होगा . पर चूँकि देश उद्घाटन के बुखार से ग्रस्त है, इसलिए वह भी जरूरी था. तो नगरपालिका वालों ने एक वरिष्ट पुलिस अधिकारी के समक्ष उद्घाटन का प्रस्ताव रखा. पर अधिकारी ने भी इनकार कर दिया. पता नही श्मशान के उद्घाटन की समस्या कैसे हल हुई पर मैने गौर से सोंचा कि श्मशान के उद्घाटन का सही तरीका क्या हो सकता है? एक तरीका तो यह हो सकता है कि उद्घाटनकर्ता खुद् जाकर वहाँ अपनी अंत्येष्टि करवा ले पर इसके लिए शायद ही कोई राजी हो.
दूसरा तरीका यह भी है कि आपके उद्घाटन करने के लिए कोई मुर्दा लाया जाये. उसे आप प्रेम से चिता पर लिटा कर मुखाग्नि प्रदान करें. लेकिन ऐसे मे एक समस्या यह भी है कि सही वक्त पर कोई मुर्दा ही नही मिले. खैर , जो भी हो कितना अच्छा लगता , जब चारों ओर उद्घाटनकर्ता के स्वागत एवं सम्मान मे बडे बडे बैनर लगे हो “ श्री श्री फलाँ फलाँ का हमारे श्मशान मे सहर्ष स्वागत है,” मरने के बाद चाहो भी तो स्वागत के बैनर तो लगने से रहे.
वैसे अब श्मशान या कब्रिस्तान भी हमारे समाज मे पैकेज का हिस्सा बनते जा रहे है. एक बिल्डर ने अपने प्रोजेक्ट की विशेषताओं का बखान विज्ञापन मे इस तरह किया,” बाजार, अस्पताल, स्टेशन , सिनेमा हाळ, पुलिस चौकी और श्मशान पांच मिनट की दूरी पर.” वसे अमरीका वगैरह मे तो कब्रिस्तान की भी जबरदस्त मार्केटिंग होती है. वहाँ कब्रिस्तान भी इस तरह सजे रहते है कि बाहर से गुजरने पर लगता है जैसे अन्दर शादी के मंडप मे कोई नवयुगल को फेर करवा रहा होगा. ऐसे ऐसे सुंदर , डिजाइनदार कब्रिस्तान होते हैं कि सौन्दर्य प्रेमी व्यक्ति हुआ तो वह जानबूझ कर मर जाये.
ऐसे ही एक सजे – धजे रमणीय कब्रिस्तान मे एक बार मै यह सोचकर घुस गया कि अन्दर शायद कोई पार्टी चल रही है. बाहर फूलों , मोमबत्तियों और अन्यान्य चीजों की दुकानें सजाये विक्रय बालायें मुस्कुरा रही थी. मै अन्दर गया तो देखा कि कब्रें भी इस कदर खूबसूरत है कि अपना तो मकान भी उसके आगे कुछ नही. कोई कब्र फूलों से ठकी है तो कोई गुलदस्तों से अटी पडी है. पर आप यह न समझ ले कि इन विदेशियो के मन मे अपने से बिछुडी आत्माओं के लिए बहुत प्यार उमड रहा है. दरसल होता यह है कि जैसे ही मरने के बाद कोई शव कब्रिस्तान मे लाया जाता है कब्रिस्तान का मार्केटिंग विभाग मुर्दे के साथ आये लोगो का अता पता , ईमेल ऐड्रेस आदि ले लेते हैं. फिर हर साल ऐन वक्त से चार दिन पहले उन्हें ई मेल भेज देते हैं.” महोदय, फलाँ फलाँ दिन को आपके चाचा , मामा, पिता या आपकी पूर्व पत्नी की पूण्यतिथि आ रही है. आप अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकालने मे असमर्थ हो अथवा उस दिन अपनी नई गर्लफ्रेंड के साथ डेतिंग पर जा रहे हो तो हम आपकी ओर से उनकी कब्र पर पुष्प गुच्छ चढा देंगे. इसके लिए आपको इतनी राशि का भुगतान करना होगा.”
भला आदमी क्रेडिट कार्ड से इंटरनेट के जरिए पेमेंट कर देता है. कब्र पर फूल चढ जाते हैं. मोमबत्तियाँ जलने लगती है.
मै कब्रिस्तान से बाहर निकल रहा था तो कुछ लोगों ने मुझे घेर लिया और बोले, “ क्या आप अपने बच्चों से प्यार करते हैं?”
अब कौन महामानव होगा जो इसका उत्तर ‘न’ में देगा. मैने जैसे ही हाँ मे सिर हिलाया वे बोले, “ हमारी कम्पनी मे एक स्कीम है. इसके तहत एक छोटी सी राशि का भुगतान आपको हर वर्ष करना है. यह छोटी सी रकम बढकर एक दिन बहुत बडी हो जायेगी.. यह रकम आपके मरने के बाद आपके अंतिम संस्कार के काम आयेगी. अब आप ही सोंचिए आपकी अंत्येष्टि पर आपके बच्चों को कुछ भी खर्च नही करना पडेगा तो उन्हे कितनी खुशी होगी.”
मैने मार्केटिंग की उस महान आत्मा को प्रणाम किया और पूछा कि क्या इस स्कीम का उद्घाटन हो चुका है या मुझसे ही इसका उद्घाटन होना है, तो महान आत्मा ने बताया कि इस स्कीम के उद्घाटन का श्रेय उनके पिताजी को जाता है.
वैसे सही मायने मे उद्घाटन की स्थिति बहुत चिंतनीय है. संगीत के कार्यक्रम का उद्घाटन बहरा व्यक्ति कर्ने आ जाता है. नाई की दुकान का उद्घाटन करने जो नेता आता है वह गंजा होता है. असल मे उद्घाटन का सही तरीका होना चाहिए . जैसे होटल का उद्घाटन करना है तो उद्घाटन कर्ता खाना खाकर और खास कर बिल चुका कर होटल का उद्घाटन करे
नारियल फोडलर और फीता काटकर उद्घाटन करने का अन्दाज कुछ पुराना सा लगता है. वैसे भी ऐन मौके पर नारियल इतना कडा निकलता है कि मंत्री जी के नाजुक हाथों से पटकने पर फूटने का नाम ही नही लेता . कई बार तो कैची इतनी भोथरी होती है कि जवाब नही.
ऐसे मे मुझे एक ऐसे उद्घाटन की याद आ रही है जो वहाँ उपस्थित लोगो को भी बहुत पसन्द आया या. दिल्ली मे एक सुलभ शौचालय का उद्घाटन होना था. उद्घाटन कर्ता ट्रैफिक मे कही फंस गये.
आते आते कई प्राकृतिक आवश्यकतायें उनके धैर्य की परीक्षा ले रहे थी. परिणामस्वरूप वे जैसे ही उद्घाटन स्थल पर पहुचे , आयोजकों को धकियाते हुए एक शौचालय के अन्दर घुस गये. पांच मिनट बाद बाहर निकले तो उनके चेहरे पर असीम शांति थी. लोगों ने पूछा तो उन्होने सहज भाव से कहा कि उन्होने बिल्कुल सही किया है और शौचालय के उद्घाटन का इससे बेहतर तरीका हो ही नही सकता था. अब यह अलग बात है कि जल्दबाजी मे मंत्री महोदय ने महिला शौचालय का उद्घाटन कर दिया.था.
इससे यह बात भी साफ हो गई कि मत्री महोदय को जिस चीज ( उद्घाटन ) का सबसे ज्यादा अनुभव होता है वह काम भी उनसे सही तरीके से नही हो सकता . आपका क्या ख्याल है?

8/8/07

पत्नियाँ पतियों को क्यों डांटती रहती है?

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पिछले दिनों फ्रेंडशिप डे आया तो मोबाइल पर कई दोस्तों के सन्देश आये. कुछ मित्रो को हमने भी सन्देश भेजे. एक दोस्त ने बंबइया हिंदी में कुछ उस तरह इजहार ए मोहब्बत की-


गॉड अपुन से पूछा किधर जाना मंगता? स्वर्ग या नर्क? अपुन बोला- नर्क. अपुन को मालूम, तुम साला दोस्त लोग उदरिच मिलेंगा. बोले तो जिधर तुम होयेंगा अपुन का स्वर्ग उदरिच .


एक संदेश ऐसा था जो अगर किसी पुरूष मित्र ने भेजा होता तो हम मजा लेकर रह जाते, पर यह संदेश एक महिला मित्र ने भेजा था.( महिला मित्र से मेरा मतलब उस तरह के पुरूष मित्र से है जिनकी बहुत ज्यादा महिलायें मित्र होती है.) संदेश छोटा सा था-


दोस्त के बगैर जिंदगी वैसी ही है जैसे वक्ष के बगैरस्त्री.


हम तो अब तक इसी दुविधा में है कि हम उनके लिए पहले क्या हैं. और वे हमारे आकार , प्रकार , व्यवहार आदि से कितने खुश है.मुझे उसी क्षण प्रसिद्ध तमिल लेखिका चूडामनी राघवन की कहानी श्री राम की माँ की नायिका याद आ गयी जो सड़क पर चलती थी तो इस कदर सीना तान कर मुस्कुराती थीजैसे कोई विशाल साम्राज्य की महारानी अपने साम्राज्य की विशालता पर मन्द मन्द मुस्कुराती है. जब उसका लड़का अपनी प्रेमिका को उससे मिलवाने घर लेकर आता है तो वह उसके सपाट सीने को देखकर सोंचती है कि उसके लडके को इस लड़की में आखिर दिखा क्या?


वहरहाल् गजब कई हुए उस दिन. मेरी बिटिया सेफी मुझे बाजार लेकर गई. अपनी दोस्तों के लिए फ्रेंडशिप बैंड खरीदने. उसने अपने दोस्तों को ख्याल में रखते हुए बताया कि इतने बैंड चाहिए. हालाँकि इसे वह राखी समझ रही थी. खैर जितने उसने बताये मैने उससे एक ज्यादा बैंड खरीदा.


बिटिया बोली- एक अधिक किसके लिए?


मैने कहा- मेरे लिए.


बिटिया बोली- आप किसे बाँधेंगे?


मैने कहा- तुम्हारी मम्मी को.


बिटिया बोली-मम्मी क्या आपकी दोस्त है?


मैंने कहा- हाँ वो मेरी बेस्ट फ्रेंड है.


इसके बाद बिटिया ने एक मासूम सा सवाल किया जिसका जवाब मुझे आज तक नहीं सूझ रहा है. उसने बड़ी सरलता से पूछा- मम्मी अगर आपकी दोस्त है तो फिर वह आपको डांटती क्यों रहती है?:-D


अब कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ बच्चन साहब ने भी किसी से यह सवाल नहीं पूछा क्योंकि ये तो सौ करोड का सवाल है. आपके पासअगर जवाब और अनुभव हो तो बताएं कि पत्नियाँ पतियों को क्यों डाँटती रहती है?


वैसे ये अलग बात है कि वह बैंड मैं अपनी पत्नी की कलाई पर नहीं बाँध पाया क्योंकि इसी बीच मेरी बिटिया ने एक और नयी दोस्त बना लिया और मुझ से बैंड छीन कर उसकी कलाई पर बाँध आई. तस्वीर में वह नई दोस्त एक पुरानी दोस्त के साथ अगल बगल दिख रही है

5/7/07

रेलवे रिजर्वेशन

सुबह सुबह पिताजी ने सोते से जगाया
और एक जोरदार लेक्चर सुनाया.
बोले तुम से तो कुछ भी नहीं हो पाता है
शर्मा जी के लड़के को देखो
बन्दे ने क्या कमाल करके दिखाया है.
बिना दलाल से मिले रेलवे रिज़र्वेशन काउंटर से
गर्मी की छुट्टी में गाँव जाने का कनफर्म टिकट ले कर आया है
अरे जरा भी शर्म है तो होश में आओ
और कहीं जाकर चुल्लू भर पानी में डूब जाओ
पिताजी का रूख देखकर मन ही घबरा गया
और सच बताउँ तीन बार चक्कर भी आ गया
तो पिताजी बोले तू तो ऐसे घबरा रहा है
जैसे रिज़र्वेशन काउंटर कोई लन्दन में है
अरे बेटे स्थिति तनाव पूर्ण किंतु नियंत्रण में है
तो अगली सुबह नहा धोकर मैंने जैसे ही
रिज़र्वेशन सेंटर जाने के लिए कदम बढ़ाया
माताजी का कोमल स्वर आया
बेटे मैं तुम्हें ऐसे ही नहीं जाने दूंगी
तू आज पहली बार टिकट लेने जा रहा है
मैं माता दुर्गे का व्रत रखूंगी
दादी माँ ने तो कमाल ही कर दिया
पुरानी सन्दूक से एक तावीज निकाल कर लायी
और मेरे बाँह में बान्ध दिया
भाभी बोली – दिन का खाना साथ रख लो
भूख लगेगी तो काम आयेगा
रात का खाना छोटा भाई तुझे दे आएगा
तो बड़े भाई बोले बिस्तर भी साथ रख लो
क्या पता काम हो आये टिकट ही लाने जा रहे हो
कहीं रात दो रात रुकना हो जाये
बड़ी बहन बोली- अब जब जा ही रहे हो रिज़र्वेशन कराने
क्या होगा ये तो भगवान ही जाने
छोटी बहन बोली- भैया मेरे साथ इंसाफ करना
मेरा कुछ कहा सुना हो तो माफ करना
खैर साहब किसी तरह घर वालों से पीछा छुरा कर बाहर आया
तो सामने एक बीमा का एजेंट नजर आया हमें देखते ही मुस्कुराया
बोला- रिज़र्वेशन कराने जा रहे हो
बहुत बड़ा रिस्क उठा रहे हो
पहले अपना बीमा कराओ
फिर टिकट लेने के लिए जाओ
पड़ोसी ने सुना तो बोला_ एक जरूरी काम कर लिया है
अरे अपनी वसीयत लिख कर रख दिया है.
खैर साहब रिज़र्वेशन सेंटर पहुँचे तो अजीब नजारा था
दृश्य बड्रा सुन्दर बड़ा प्यारा था क़तारों में कतार थी
भीड़ एक दूसरे के सिर पर सवार थी;
किसी की ज़बान पर जीसस किसी के मुँह पर अल्लाह
तो किसी के मन में हनुमान था
पूरा रिज़र्वेशन सेंटर अपने आप में एक छोटा सा हिन्दुस्तान था
लोग लेटे थे बैठे थे खड़े थे
कुछ तो बिस्तर बिछाये पड़े थे
तो हनुमान चालीसा पढ़ता हुआ
मैं भी एक कतार में खड़ा हुआ
आगे खड़ा बूढ़ा अखबार पढ़ रहा था
बड़ा निश्चिंत लग रहा था
मैंने कहा क्या पेपर आज का है
वो बोला जी नहीं पिछले इतवार का है
मैं बोला क्यू भाया
बोला- क्या करुँ उसके बाद से इधर कोई बेचने ही नहीं आया
मैं ने कहा – आज मेरी मां ने माता दुर्गे का व्रत रखा है
मैं टिकट लेकर जाउंगा तो प्रसाद खिलायेगी
बगल में खड़ा बूढा बोला- बेचारी दिन भर का उपवास करके
मुफ्त में पछतायेगी
तुम्हे नहीं मालूम इस टिकट की कतार ने
मेरी जिन्दगी का कितना बड़ा हिस्सा लिया है
अरे मैंने तो अपनी लड़की का रिश्ता भी
अभी अभी इसी कतार में तय किया है
मैंने कहा कौन है कौन है?
मतलब आपका होने वाला रिश्तेदार बोला खुद नहीं समझ सकते
अरे और कौन ये काउंटर पर बैठा सरदार
मैं ने कहा इस बूढ़े खूसट से करेंगे अपनी लड़की की शादी
तब तो हो गई उसकी पूरी बरबादी
बोला बरबादी किस की है ये तो वक्त ही बतलायेगा
लेकिन हर साल गर्मी में गाँव जाने का टिकट तो आसानी से मिल जायेगा
तो मित्रों इसी तरह सुबह का सूरज शाम को अस्त हो रहा था
और मैं भी ख्डा खड़ा बिल्कुल पस्त हो रहा था.
बजने को थे रात के आठ
और आगे अभी भी आगे आदमी खड़े थे साठ
तभी भगदड़ सी मची शोर में मेरा स्वर मन्द हो गया
और देखते ही देखते काउंटर भी बन्द हो गया
तो खाली हाथ घर आये मुँह लटकाये
अब कैसे बतायें कैसे बताय़ें कि टिकट नहीं मिला है
कि टिकट मिलना एक भरम है एक भुलावा है
एक धोखा है एक छलावा है
सो कुछ कह नहीं पाया तो मुँह लटका कर ख़डा हो गया
तो बड़ा भाई बोला टिकट तो मिला नहीं क्या फायदा मुंह लटकाने से ?
बन्द करो इस नाटक को चेहरे पे बारह बज रहे हैं
जैसे चेहरा नहीं अनाथालय का फाटक हो.
मगर इससे पहले कि कुछ बताता
अपनी सफाई मैं कुछ सुनाता
बड़ी बहन आ कर पीठ सह लाने लगी
छोटी ढाढ़स दिलाने लगी
बोली ये भी अच्छा है कि टिकट की किल्लत है.
आसानी से नहीं मिलती है.
पर आज के जमाने में क्या पता
कब कहाँ कौन सी ट्रेन में बम का धमाका हो जाये
और हम गाँव पहुंचने के बजाय कहीं और पहुंच जायें
तो मित्रों कविता समाप्त हुई
पर आप तालिय़ाँ बजाने का कष्ट मत कीजिए
और कविता जरा सी भी पसन्द आई हो
Pतो अगली गर्मी की छुट्टी में गाँव जाने की
पाँच कनफर्म टिकट दिलवा दीजिए.