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20/11/07

त्वरित टिप्पणियों की टकसाल: हिन्दी कवि सम्मेलन

टिप्पणियों के बेताज बादशाह: श्याम ज्वालामुखी

ब्लाग पर टिप्पणियाँ देने का चलन आम है. मेरी जानकारी में हिन्दी ब्लाग पर टिप्पणियाँ देने मे उड़न तश्तरी वाले कनाडियन भारतीय समीर लाल जी का कोई तोड़ नहीं है. ब्लागर दोस्तों से टिप्पणियों के सन्दर्भ में बात चीत हो तो कई तो अक्सर ये सोंचते दिखते हैं कि समीर जी ने कोई बन्दा रखा हुआ है जो उनकी ओर से तुरत टिप्पणियाँ पोस्ट करता रहता है वर्ना सभी ब्लाग पर समीर जी की पहली टिप्पणी का जादू समझ के बाहर है. लोग समझ नहीं पाते हैं कि समीर जी अगर दिन रात ब्लाग पढते और टिप्पणियाँ ही करते रहते हैं तो वे बाकी काम कब करते होंगे.पर मेरा मानना है कि महान लोगों के काम करने का ढंग भी जुदा होता है. मुझे एक शेर याद आता है

कोई चार दिन की जिन्दगी मे सौ काम करता है
किसी की सौ बरस के जिन्दगी में कुछ नही होता.

मेरी समझ से यही समीर भाई का राज है.

बहरहाल मैं हिन्दी कवि सम्मेलनों की बात करना चाह रहा था. कवि सम्मेलन मे कविता तो महत्वपूर्ण होती ही है. पर श्रोताओं का प्रतिसाद जिस एक चीज पर सबसे ज्यादा मिलती है वह है कवि या संचालक द्वारा कवि सम्मेलन के दौरान के गई त्वरित टिप्पणियाँ.
त्वरित टिप्पणियाँ देने में कई मंचीय हिन्दी कवियों का कोई जवाब नहीं है. वर्तमान में सत्य नारायण सत्तन ,
अशोक चक्रधर , सुभाष काबरा ,अरुण जैमिनी ,कुमार विश्वास, किरण जोशी , सुनील जोगी आदि हिन्दी मंच के उन विरल विभूतियों में से हैं जो घटित हो रही घटनाओं पर अपनी त्वरित टिप्पणियों से श्रोता समूह पर एक जादू सा करते हैं और उन्हें आह्लादित कर देते हैं। स्वर्गीय श्याम तो इसके मास्टर ब्लास्टर थे और टिप्पणियों की वो बारिश करते थे कि लोग गिनती ही नही सुध बुध सब भूल जाते थे.

एक बारमेरी शादी हुई
किसी कवि का एक जुमला जिसे देश के कई कवि ले उड़े वो है”’एक बार’ मेरी शादी हुई” इस जुमले में ‘एक बार’ का जवाब नहीं है. श्रोता बरबस पूछ बैठते हैं –एक बार? और कवि कहता है – जी हाँ आप लोगों की कृपा से अभी तक एक बार ही हुई है.

माइक वाले को एडवांस में पेमेंट
अकसर कवि सम्मेलन मे माइक सिस्टम खराब हो जाता है. ऐसी स्थिति मे एक जुमला लोगों को बहुत गुदगुदाता है. कवि कहता है- लगता है आयोजकों ने माइक वाले को एडवांस में पेमेंट कर दिया है. श्रोताओं क यह टिप्पणी अनायास ही गुदगुदा देती है.

माईक पर गणेश जी खड़े हैं
दिल्ली के अरुण जैमिनी ग्वालियर निवासी प्रदीप चौबे के स्थूल शरीर पर छींटाकसी करते हुए अकसर कहते हैं- ऐसा लग रहा है माएक पर गणेश जी खडे हैं और प्रदीप चौबे आनन फानन अरूण जमिनी को लक्षित करते हुए कहते हैं – बड़े माईक पर गणेश जी खड़े हैं और छोटी माइक पर उनकी सवारी मौजूद है. इस पर श्रोता अनायास खिलखिला उठता है.

कविता वोई और कवि कोई
कवि सम्मेलन की वर्तमान अराजकता पर जिसमें जिसको मौका मिले जिसकी भी कविता हो बिना नाम तक लिए कवि पढ देता है तालियाँ लूट कर ले जात है टिप्पणी करते हुए व्यक्तिगत बातचीत मे श्याम ज्वालामुखी कहा करते थे. पहले के जमाने मे कवि सम्मेलन में वोई कवि और वोई कविता हुआ करती थी और अब कविता वोई और कवि कोई.

बिहारी आदमी की ताकत
पिछले दिनों माँ सरस्वती की कृपा से एक ऐसी ही टिप्पणी मेरे मुँह से भी निकली. हुआ यों के दादर में एक कवि सम्मेलन था. युगराज जैन बतौर संचालक निमंत्रित थे. कवि गण थे- महेश दूबे, सुरेश मिश्रा, अनिल मिश्र, मोतीलाल श्रीवास्तव, शिखा पांडेय और मैं खुद. युगराज भाई ट्रैफिक में कहीं फंसे हुए थे और आयोजक कार्यक्रम शुरू करने को आमादा हो रहे थे. आखिरकार सुरेश मिश्र ने कार्यक्रम का संचालन शुरू किया और मोतीलालजी को काव्यपाठ के लिए खड़ा कर दिया. उनके काव्यपाठ के उपरांत मुझे खड़ा करने से पहले मेरे राज्य बिहार की काफी ‘तारीफ’ की और यहाँ तक कहा कि जो तालियाँ नहीं बजायेगा उस श्रोता का अगला जन्म भी बिहार में होगा. पर इसी बीच मूल संचालक युगराज जैन पधार चुके थे. सुरेश मिश्रा ने युगराज जी को मंच पर बुलाया और संचालन का भार उन्हे सौपते हुए खुद कवियों के बीच स्थापित हो गये. सामने श्रोताओं के बीच महाराष्ट्र के पूर्व गृह राज्य मंत्री कृपा शंकर सिंह और वरिष्ट पत्रकार नन्द किशोर नौटियाल भी मौजूद थे. मैं माईक पर आया और पहला ही वाक्य मेरी कंढ से फूटा- आपको बिहारी आदमी की ताकत का अन्दाजा इसी से हो गया होगा कि उसके आने से पहले ही आदमी अपनी गद्दी छोड कर दूसरे को सौंप देता है. श्रोताओं की वह हंसी और उनके हाथ की वो तालियाँ .अहा हा क्या बताउँ ? मैं देर तक उस नशे मे रहा.

27/8/07

हमने बेचारे माँ बाप को परिवार से छाँट दिया है

पिछले दिनों
अखबार में ये खबर पढकर
कि मुम्बई के मालाबार हिल इलाके की
एक बहुमंजिली इमारत से कूद कर
दो वृद्ध दम्पत्ति मर गये
मेरे दिल मे उदासी
और आंखों में आंसू भर गये
बहुत देर तक मैं उनके बारे में
सोंचता रहा
और उनकी ही बिल्डिंग के नीचे पडे
उनके मृत देह का दृश्य
मुझे कचोटता रहा
तब मुझे लगा
कि आजकल
हम अपने दायरे में
कुछ इस कदर सिमट गये हैं
कि हमे जन्म देने वाले
माँ बाप से ही हम कट गये हैं
हम दो हमारे दो के इस नारे ने
बस इतना भर किया है
कि परिवार का मतलब
सिर्फ मियाँ बीबी और
बच्चे भर रह गया है
हमने उन दोनो बेचारे माँ बाप को
परिवार से छाँट दिया है
किसी लैंड लाइन का
कनेक्शन समझ कर काट दिया है.
आजकल हर किसी के दिमाग में
यही घर कर रहा है
कि उसका काम तो मोबाईल से चल रहा है
और वो फालतू मे
हर महीने लैंडलाइन का बिल भर रहा है
लेकिन हम ये भूल जाते हैं
कि माँ बाप चाहे कहीं भी रहें
हम पल भर भी
उनके आशीर्वाद के कवरेज एरिया से
बाहर नही जाते हैं
और तो और
अरे ये मोबाईल का कनेक्शन लेते वक्त भी
ये लैंडलाइन ही है
जिनके बिल हमारे काम आते हैं
हम अगर समय पर नहीं चेते
तो अपने किये का नतीजा भुगतेंगे
सिर्फ और सिर्फ पछतायेंगे
उस दिन कुछ भी नही कर पायेंगे
जिस दिन हमारे बच्चे
खुद हमारे नेट वर्क ऐरिया के
बाहर चले जायेंगे.

23/8/07

एक नेताजी, एक श्मशान और उसका उद्घाटन.

केंन्द्र से लेकर ग्राम पंचायत तक, जहाँ भी देखो निर्माण ही निर्माण चल रहा है. लेकिन सारे निर्माण की तब तक कोई महत्ता नही है, जब तक किसी मंत्री जी के हाथों से उसका उद्घाटन न हो जाये. कई महीनों तक मुम्बई मे एक फ्लाई ओवर का उपयोग शान से शहर के आवारा कुत्ते करते रहे पर आदमियों को उसका उपयोग करने की मनाही थी क्योकि उसके उद्घाटन के लिए कोई बड़ा मंत्री नही मिल पा रहा था. मंत्रियों की भी बुरी हालत है. इतने निर्माण , इतने उद्घाटन . कहाँ कहाँ मारे-मारे फिरते रहें.
पर बिना उद्घाटन के निर्माण का महत्व ही क्या है? निर्माण का महत्व तभी है जब कोई बडा नेता शिलान्यास करे, बडे बडे ठेकेदार निर्माण करें और बडे बडे मंत्री उसका उद्घाटन करें . फिर जनता उसका उपयोग करे तो कितना अच्छा लगता है.. पिछले दिनों मुम्बई मे एक अजीब वाकया हुआ. नगरपालिका ने श्मशान घाट का निर्माण करवाया पर उसके उद्घाटन के लिए कोई मंत्री खाली ही नही मिल रहा था. जो खाली रहा होगा, वह राजी नही हुआ होगा . पर चूँकि देश उद्घाटन के बुखार से ग्रस्त है, इसलिए वह भी जरूरी था. तो नगरपालिका वालों ने एक वरिष्ट पुलिस अधिकारी के समक्ष उद्घाटन का प्रस्ताव रखा. पर अधिकारी ने भी इनकार कर दिया. पता नही श्मशान के उद्घाटन की समस्या कैसे हल हुई पर मैने गौर से सोंचा कि श्मशान के उद्घाटन का सही तरीका क्या हो सकता है? एक तरीका तो यह हो सकता है कि उद्घाटनकर्ता खुद् जाकर वहाँ अपनी अंत्येष्टि करवा ले पर इसके लिए शायद ही कोई राजी हो.
दूसरा तरीका यह भी है कि आपके उद्घाटन करने के लिए कोई मुर्दा लाया जाये. उसे आप प्रेम से चिता पर लिटा कर मुखाग्नि प्रदान करें. लेकिन ऐसे मे एक समस्या यह भी है कि सही वक्त पर कोई मुर्दा ही नही मिले. खैर , जो भी हो कितना अच्छा लगता , जब चारों ओर उद्घाटनकर्ता के स्वागत एवं सम्मान मे बडे बडे बैनर लगे हो “ श्री श्री फलाँ फलाँ का हमारे श्मशान मे सहर्ष स्वागत है,” मरने के बाद चाहो भी तो स्वागत के बैनर तो लगने से रहे.
वैसे अब श्मशान या कब्रिस्तान भी हमारे समाज मे पैकेज का हिस्सा बनते जा रहे है. एक बिल्डर ने अपने प्रोजेक्ट की विशेषताओं का बखान विज्ञापन मे इस तरह किया,” बाजार, अस्पताल, स्टेशन , सिनेमा हाळ, पुलिस चौकी और श्मशान पांच मिनट की दूरी पर.” वसे अमरीका वगैरह मे तो कब्रिस्तान की भी जबरदस्त मार्केटिंग होती है. वहाँ कब्रिस्तान भी इस तरह सजे रहते है कि बाहर से गुजरने पर लगता है जैसे अन्दर शादी के मंडप मे कोई नवयुगल को फेर करवा रहा होगा. ऐसे ऐसे सुंदर , डिजाइनदार कब्रिस्तान होते हैं कि सौन्दर्य प्रेमी व्यक्ति हुआ तो वह जानबूझ कर मर जाये.
ऐसे ही एक सजे – धजे रमणीय कब्रिस्तान मे एक बार मै यह सोचकर घुस गया कि अन्दर शायद कोई पार्टी चल रही है. बाहर फूलों , मोमबत्तियों और अन्यान्य चीजों की दुकानें सजाये विक्रय बालायें मुस्कुरा रही थी. मै अन्दर गया तो देखा कि कब्रें भी इस कदर खूबसूरत है कि अपना तो मकान भी उसके आगे कुछ नही. कोई कब्र फूलों से ठकी है तो कोई गुलदस्तों से अटी पडी है. पर आप यह न समझ ले कि इन विदेशियो के मन मे अपने से बिछुडी आत्माओं के लिए बहुत प्यार उमड रहा है. दरसल होता यह है कि जैसे ही मरने के बाद कोई शव कब्रिस्तान मे लाया जाता है कब्रिस्तान का मार्केटिंग विभाग मुर्दे के साथ आये लोगो का अता पता , ईमेल ऐड्रेस आदि ले लेते हैं. फिर हर साल ऐन वक्त से चार दिन पहले उन्हें ई मेल भेज देते हैं.” महोदय, फलाँ फलाँ दिन को आपके चाचा , मामा, पिता या आपकी पूर्व पत्नी की पूण्यतिथि आ रही है. आप अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकालने मे असमर्थ हो अथवा उस दिन अपनी नई गर्लफ्रेंड के साथ डेतिंग पर जा रहे हो तो हम आपकी ओर से उनकी कब्र पर पुष्प गुच्छ चढा देंगे. इसके लिए आपको इतनी राशि का भुगतान करना होगा.”
भला आदमी क्रेडिट कार्ड से इंटरनेट के जरिए पेमेंट कर देता है. कब्र पर फूल चढ जाते हैं. मोमबत्तियाँ जलने लगती है.
मै कब्रिस्तान से बाहर निकल रहा था तो कुछ लोगों ने मुझे घेर लिया और बोले, “ क्या आप अपने बच्चों से प्यार करते हैं?”
अब कौन महामानव होगा जो इसका उत्तर ‘न’ में देगा. मैने जैसे ही हाँ मे सिर हिलाया वे बोले, “ हमारी कम्पनी मे एक स्कीम है. इसके तहत एक छोटी सी राशि का भुगतान आपको हर वर्ष करना है. यह छोटी सी रकम बढकर एक दिन बहुत बडी हो जायेगी.. यह रकम आपके मरने के बाद आपके अंतिम संस्कार के काम आयेगी. अब आप ही सोंचिए आपकी अंत्येष्टि पर आपके बच्चों को कुछ भी खर्च नही करना पडेगा तो उन्हे कितनी खुशी होगी.”
मैने मार्केटिंग की उस महान आत्मा को प्रणाम किया और पूछा कि क्या इस स्कीम का उद्घाटन हो चुका है या मुझसे ही इसका उद्घाटन होना है, तो महान आत्मा ने बताया कि इस स्कीम के उद्घाटन का श्रेय उनके पिताजी को जाता है.
वैसे सही मायने मे उद्घाटन की स्थिति बहुत चिंतनीय है. संगीत के कार्यक्रम का उद्घाटन बहरा व्यक्ति कर्ने आ जाता है. नाई की दुकान का उद्घाटन करने जो नेता आता है वह गंजा होता है. असल मे उद्घाटन का सही तरीका होना चाहिए . जैसे होटल का उद्घाटन करना है तो उद्घाटन कर्ता खाना खाकर और खास कर बिल चुका कर होटल का उद्घाटन करे
नारियल फोडलर और फीता काटकर उद्घाटन करने का अन्दाज कुछ पुराना सा लगता है. वैसे भी ऐन मौके पर नारियल इतना कडा निकलता है कि मंत्री जी के नाजुक हाथों से पटकने पर फूटने का नाम ही नही लेता . कई बार तो कैची इतनी भोथरी होती है कि जवाब नही.
ऐसे मे मुझे एक ऐसे उद्घाटन की याद आ रही है जो वहाँ उपस्थित लोगो को भी बहुत पसन्द आया या. दिल्ली मे एक सुलभ शौचालय का उद्घाटन होना था. उद्घाटन कर्ता ट्रैफिक मे कही फंस गये.
आते आते कई प्राकृतिक आवश्यकतायें उनके धैर्य की परीक्षा ले रहे थी. परिणामस्वरूप वे जैसे ही उद्घाटन स्थल पर पहुचे , आयोजकों को धकियाते हुए एक शौचालय के अन्दर घुस गये. पांच मिनट बाद बाहर निकले तो उनके चेहरे पर असीम शांति थी. लोगों ने पूछा तो उन्होने सहज भाव से कहा कि उन्होने बिल्कुल सही किया है और शौचालय के उद्घाटन का इससे बेहतर तरीका हो ही नही सकता था. अब यह अलग बात है कि जल्दबाजी मे मंत्री महोदय ने महिला शौचालय का उद्घाटन कर दिया.था.
इससे यह बात भी साफ हो गई कि मत्री महोदय को जिस चीज ( उद्घाटन ) का सबसे ज्यादा अनुभव होता है वह काम भी उनसे सही तरीके से नही हो सकता . आपका क्या ख्याल है?

19/7/07

सौ साल पहले मैं कर्जदार था

आपने कभी उधार लिया है. या ऐसे भी पूछा जा सकता है कि आपको कभी किसी ने उधार दिया है. उधारी के बडे किस्से हैं एक आदमी ने ट्रेन में किसी अंजान यात्री से उधार मांगा. अंजान आदमी बोला- आप मुझसे उधार कैसे मांग रहे है मैं तो आपको जानता नहीं, बन्दा बोला- इसी लिए तो आपसे मांग रहा हूँ.जो जानते हैं वो तो देते नहीं है. ऐसे ही एक स्कूल में शिक्षक ने गणित की क्लास में एक लडके से पूछा- मान लो मैने तुम्हारे पिताजी को 1200 रूपये पन्द्रह प्रतिशत ब्याज पर 6 महीने के लिए उधार दिया तो 6 महीने बाद तुम्हारे पिता जी कितना पैसा लौटायेंगे? लड़का बोला- तुम इतना सा गणित भी नहीं जानते. ळडका बोला – मैं गणित बहुत अच्छी तरह जानता हूँ . मगर आप मेरे बाप को नहीं जानते. किसी का लौटाया है जो आपका लौटायेंगे. तो उधार मांगना एक कला है. अगर आपको उधार मिल जाये तो आप सही कलाकार हैं. लेकर कभी न लौटायें तो आप सुपर हिट है. चलिए एक पैरोडी लिजिए. अगर आप बाथरूम टाइप के सिंगर है और इसे गाना चाहते हैं तो मुझे खुशी होगी. अगर रिकार्ड निकलवाना चाहे तो मुझे सूचित करें. पैरोडी मैंने इस तरह लिखी है.
सौ साल पहले मैं कर्जदार था, 2
आज भी हूँ और कल भी रहूंगा
माँ बाप बीवी बच्चों के
सिर का मैं भार था 2
आज भी हू और कल भी रहूंगा. उधार जब कोई मिल जाये
मेरी तबीयत खिल जाती है जब वापस करना हो तो
मेरी नानी मर जाती है
देने वालो का हरदम करता इंतजार था 2
आज भी हू और कल भी करूंगा सौ साल पहले...........
एक वार जो देते फिर
ता उम्र वे रोते हैं
वे जागा करते रातों को
हम चैन से सोते है.
मैं तो पैदाएशी ऐसा होशियार था 2
आज भी हूँ और कल भी रहूंगा
सौ साल पहले...........
इस घर में टी वी ,फ्रीज
और सोफा उधार से है हर हसीन जलवा
और मस्त बहार उधार से है उधार से ही लेने की
सौचता हर बार था 2 आज भी हूँ और कल भी रहूंगा
सौ साल पहले मैं कर्जदार था,

किस्सा अमिताभ बच्चन , रेखा और एक बकरी का

आप कलेक्टर हैं, आपके पिताजी कलेक्टर है या कि आप स्वय कलेक्टर साहब के पिताजी है इससे कोइ फर्क नहीं पड़ता. आप जरूर बहुत बडे तोप होंगे . पर निश्चित रूप से अपने बाथ रूम के अन्दर होंगे . आप जो भी तोप , तमंचा या तलवार हो किंतु अगर आप हिन्दी फिल्मों से वाकिफ हैं तो फिल्म सितारों के प्रति लोगों की दीवानगी से नावाकिफ नहीं होंगे.
एक बूढ़े कलेक्टर साहब मिले. मुँह के दाँत गिर चुके हैं. सेवा से रिटायर्ड हैं और अब पुराने दिनों की यादो की जुगाली करते हुए दिन बिताते है. गर्मी की छुट्टियों में गांव गया था तो उनसे मुलाकात हुई. एक दूसरे से मिलकर हम दोनों अति प्रसन्न हुए. फिल्म, साहित्य और कुल मिलाकर जिंदगी के अनेकानेक पहलुओ पर कई दिनों चर्चा चली. एक दिन उन्होंने एक घटना का जिक्र किया. बोले उमराव जान की शूटिंग लखनऊ में हुई थी. और जब शूटिंग हो रही थी वे तब वहाँ के जिला मजिस्ट्रेट थे. रेखा को उन्होने तब वही साक्षात देखा था और तब से अब तक वह उनकी आँखों के आगे गाहे बगाहे वही बोल बोल कर फुर्र हो जाती है कि दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए . वे शूटिंग के लिए वहाँ लखनऊ आयी थी. उन्होने रेखा के बहुत अनुरोध करने पर उसके साथ अपना एक फोटो भी अपने निजी कैमरे से निकलवाया था ताकि सनद रहे. और जब कैमरा कलेक्टर साहब का अपना था तो जाहिर है फोटोग्राफर भी उनका अपना ही रहा होगा. तो फोटो निकाली साहब के एक परम प्रिय चपरासी ने. जब फोटो साफ कराया गया तो चपरासी की फोटोग्राफी की प्रतिभा और कैमरे की विलक्षण क्वालिटी का पता चला. फोटो में न रेखा थी न कलेक्टर साहब थे. था तो बस आधे फ़ोटो में जमीन थी और आधे में आसमान था. इस तरह शेर गलत साबित हो रहा था कि
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कभी जमीं मिलती है तो आसमां नहीं मिलता
इस तस्वीर में मुकम्मल जहां था , जमीन भी थी और आसमान भी था. बस नहीं था तो कलेक्टर साहब नहीं थे और रेखा नहीं थी. वह तस्वीर उन्होंने बड़े जतन से संभाल कर अपने अलबम में रखी हुई है जिसे देख कर हम भी धन्य हो गए.
मान लीजिए , क्योंकि मानने के अलावा और कोइ उपाय नहीं है. आप आज अमिताभ बच्चन से मिलें उनके साथ एक तस्वीर निकलवाने का सौभाग्य भी आपको प्राप्त हुआ. या तस्वीर भी छोडिये आपने अमिताभ बच्चन का साक्षात दर्शन किया. तो आप जिस दिन मृत्यु शय्या पर भी होंगे और चर्चा चलेगी तो आप झट उठ कर कहेंगे कि आपने अमिताभ बच्चन को करीब से देखा है और उनके साथ आपका फोटो भी है. अपने बेटे , पोते , पोतियों , नातियों , सब को जब जब आपको मौका मिलेगा बतायेंगे कि उनके साथ आपकी तस्वीर है .
मैने मुम्बई के एक फर्निचर शाँप में आमिर खान को देखा. लडकियाँ आस पास मडरा रही थी और लडके और बूढे लडकियों के आस पास मडरा रहे थे. तभी एक मुसलिम लड़की ने आमिर को देखा और देखते ही चिल्लायी – आ..........मिर भा..........ई........फिर चिल्लाती हुई उससे लिपटने के लिए उसकी और दौडती हुई भागी. मगर हाय रे किस्मत और हाय रे किस्मत की मार ! बेरहम सिक्यूरिटी वालों ने इस बिछडी हुई बहन को अपनी मंजिल तक पहुँचने से पहले ही रोक लिया. हालांकि बहन जी अपनी प्रूरी ताकत के साथ सिक्यूरिटी वालों से जूझ रही थी और लगातार आमिर भाई आमिर भाई चिल्लाये जा रही थी. शायद इसी का असर हुआ कि किसी तरह आमिर ने खुद आगे बढ़ कर उससे हाथ मिलाया और हाथ भी क्या मिलाया दोनो की दो- दो उंगलियां 1/10 सेंकेंड के लिए एक दूसरे को छू गयी होगी . और इतने में ही दोनों वहां मौजूद सिक्यूरिटी वालों की मदद से सदा के लिए जुदा हो गये. पांच फीट की लड़की फर्निचर शाप से बाहर निकली तो छे छे फिट ऊपर उछल रही थी. बल्कि लोगों ने देखा कि लड़की के पाँव आधे घंटे के लिए, जब तक वह वहाँ रही, जमीन पर पड़े ही नहीं.
लेकिन हम ठहरे निपट गाँव के आदमी. हमारे दादा जी जो अब नहीं रहे ने कभी कोई फिल्म नहीं देखी थी . वे अमिताभ बच्चन या रेखा को भी नहीं जानते थे. पिछले साल हम गाँव गये तो अपना डिजिटल कैमरा लेकर गये थे. लोगों की खूब तस्वीरे उतारी क्योंकि कोई खर्चा तो होना नहीं था. गाँव का फील देने के लिए कुछ लोगों से उन्हें अपने कन्धे पर आस पास बेवजह मिमिया रही बकरियो को उठा लेने को कहा. तस्वीरें अच्छी आयी. कुछ दिनों बाद फिर गाँव गये तो लोगों ने कहा कि हमारी भी एक तस्वीर बकरी के साथ निकालो. गाँव भर से बकरियाँ खोज खोज कर लायी गयी और हमने कई बकरियों और बच्चों की तस्वीरें निकाली. मेरी पाँच साल की बेटी गाँव से वापस मुम्बई के लिए चली तो खूब रोई. बोली एक बकरी साथ ले चलो. खैर बकरी तो नहीं ला पाये. पर ये यादे साथ आ गयी
तो कुल मिला कर कहने का मतलब ये था कि आज भी हमारे गाँव के बच्चो और बूढों के लिए एक बकरी अमिताभ बच्चन और रेखा से बढ़कर है क्योंकि उन्हें वे कन्धे पर बिठा सकते है, गोद में ले सकते है. बकरी उन्हें दूध भी देती है. आखिर गांधी जी ही तो इसी बकरी के दूध को हजार नियामत से बढाकर मानते थे . ये फिल्म स्टार तो उन्हें सुनहरे सपनों के सिवा कुछ दे नहीं पाते. चलिए चलते चलते वह शेर सुन लीजिए जो गांव की ही एक बकरी ने बड़ी मासूमियत के साथ मेरे कान में सुनाया था.

आप मेरा कत्ल करेंगे इसकी तो उम्मीद थी
पर उस दिन क्यों किया जिस दिन बकरीद थी.

17/7/07

एक मोटी की लव स्टोरी

हिरोइन परेशान थी. वह मोटी हो गयी थी और होती ही चली जा रही थी. पता नहीं पब्लिक मोटी हिरोइन को पसन्द करेगी या नहीं. पर पब्लिक तो बाद में. मालूम नहीं डायरेक्टर , प्रोड्यूशर भी पसन्द करें या नहीं. तभी सिग्नल पर हिरोइन को डायरेक्टर दिखा. डायरेक्टर भी काफी परेशान चल रहा था. फ्लाँप फिल्मो का उसका रिकार्ड कुछ ज्यादा ही लम्बा होता जा रहा था. कोई फायनेंसर उस पर निगाह डालने को तैयार न था और अंडर वर्ल्ड के पजामे के अन्दर तक अभी उसकी टाँग पहुंच नहीं पायी थी. ऐसे में हिरोइन की निगाह उस पर पड़ी तो उसकी आत्मा हरी हो गई. चूँकि अभी शाम नहीं ढली थी और रात का नशा पूरी तरह उतरा नहीं था इसलिए दोनों ने तय किया कि डिस्कसशन के लिए काँफी टेबल ज्यादा उपयुक्त रहेगा. दोनों ही बार को पार कर कैफे में घुसे . हिरोइन ने बैरे के आने से पहले अपनी फिक्र जाहिर की कि वह न चाहते हुए भी मोटी हुई जा रही है. डायरेक्टर बोला वह न चाहते हुए भी फ्लाँप पर फ्लाँप फिल्मे दिये जा रहा है. दोनों ने सोचा कुछ करना चाहिए और जब करना ही है तो क्यों न एक दूजे के लिए करे. डायरेक्टर बोला- मैं तुझे साईन करना चाहता हूँ..
हिरोइन मन ही मन खुश हुई पर उपर उपर बोली- मुझ मोटी को? डायरेक्टर बोला- हाँ . फिल्म का नाम है एक मोटी की लव स्टोरी. हिरोइन खुश हो गई तो डायरेक्टर ने उसकी खुशी कम करते हुए कहा- पर फायनेंस है नहीं इसलिए मैं कुछ दे नहीं पाउंगा. हिरोइन बोली- हम फ्रेंड है. तो फ्रेंड किस दिन काम आते हैं? मैं तुम्हारे बुरे वक्त में कुछ हेल्प करना चाहूँ तो ये तो मेरा हक बनता है. डायरेक्टर ने आँखों में शरारत भरते हुए पूछा- पूछोगी नहीं इस्टोरी क्या है.
हिरोइन बोली- आप भी मजाक करते हैं. पिछली बार इस्टोरी पूछी थी तो आपने मुझे फिल्म से ही आउट कर दिया था. डायरेक्टर खुश होते हुए बोला- गुड! तुम्हारा एप्रोच बिल्कुल प्रोफेशनल हो गया है.
वैसे मुझे भी मालूम नही कि कहानी क्या होगी. हो सकता है मैं किसी फाँरेन फिल्म से इस्टोरी लूंगा. काँफी की चुस्की लेते हुए डायरेक्टर ने बात आगे बढाई- इस्टोरी चूँकि है नहीं इसलिए तय है कि फिल्म में कुछ सीन नमकीन होंगे. कोई एतराज तो नहीं? हिरोइन बोली- सर पिछली बार एतराज किय था तो आपने मेरा रोल काटकर पाँच मिनिट का कर दिया था. मैं क्या पागल हूँ?( आखिरी वाक्य हिरोइन ने इस अन्दाज में कहा जैसे वह सचमुच पागल नहीं हो) हिरोइन ने सवाल क्या- हीरो कौन होगा? डायरेक्टर बोला- एक तो तू वैसे ही मोटी हो गई हो. दूसरे मेरे पास फायनेंस भी नहीं है. कोई हीरो राज़ी नहीं होगा. तो क्या बिना हीरो के फिल्म बनाओगे? मैं सोंचता हूँ अपने बडे बेटे को हीरो बना दूँ मगर बड़ा बेटा तो अभी बहुत छोटा है और बोतल से दूध पीता है. क्या तुम मुझे माँ का रोल दे रहे हो? डायरेक्टर बोला- नहीं वह तुम्हारे ब्वाय फ्रेंड का रोल करेगा. हम कम्प्यूटर की मदद से उसका डांस वगैरह दिखा देंगे. हिरोइन बोली- मगर बडी- बडी मल्टीस्टारर फिल्मे फ्लाँप हो रही है. एक मोटी हिरोइन और छोटे हीरो से फिल्म का क्या होगा? डायरेक्टर बोल- तुम चिंता मत करो. हमें प्लान करना पडेगा हिरोइन पूरे अटेंशन के साथ आगे झुक गाई तो डायरेक्टर बोली- फिल्म रीलीज होने से पहले तुम कानून का दरवाजा खटखटाओगी कि इस फिल्म मैं तुम जिंतनी मोटी नहीं हो उससे ज्यादा दिखाई गई हो. इतनी मोटी देखकर तुम्हारे फैन तुमसे नाराज हो जायेगे. वैसे ये अलग बात है कि तुम्हें ज्यादा मोटी देख कर तुम्हारे फैन और खुश होंगे. खबर की भूखी प्यासी मिडिया इस खबर लो ले उडेगी. हो सके और थियेटर मालिक राजी हो तो एक- आध जगह हम तुम्हारे फैन से थियेटर पर तोड फोड भी करा देंगे. फिर देखना कैसे होती है हमारी पिक्चर सुपर हिट! काँफी खत्म हो चुकी थी इसलिए दोनो मुस्कुराते हुए कैफे से बाहर निकल पडे हास्य व्यंग्य, फिल्म.