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30/7/09

हम एक राह के मुसाफिर है


कहीं अन्दर

बहुत अन्दर

खुद को तुझ में पाता हूँ

और तुम को खुद में

पर फिर भी जाने कौन सी

शीशे की दीवार है कहीं

कि न मैं तुम्हें छू पाता हूँ

और न तुम मुझे

हम एक ही राह के मुसाफिर है

पर एक राह के मुसाफिर

युगों-युगों से श्राप ग्रस्त है

कि वे एक दूसरे के साथ चलते हुए भी

एक दूसरे को नहीं पहचानते

क्योंकि उनकी नजरे एक दूसरे पर नहीं

दूर कही मंजिल पर होती है.

11/6/09

इंतजार है उस चिड़िया का

वो नन्हीं चिड़िया भी अजीब थी
हमारे छोटे से घर के
छोटे से बरामदे के
एक कोने में बना रही थी
अपना
छोटा सा घोंसला

बरसात शुरू होने के
बिल्कुल पहले

हम हैरान होते
बिना किसी कैलेंडर के
चिड़िया को कैसे
लग जाती है खबर
मानसून के आमद की ?

सुबह की पहली किरण फूटने से
शाम ढ़ल जाने तक
चोंच में दबा दबा कर लाती थी
सूखी घास के अनगिन तिनके
जाने कहाँ कहाँ से
और कितनी कितनी दूर से

पत्नी सफाई करते
बड़ा ध्यान रखती थी उस घोंसले का
और तारीफ करती थकती न थी
चिड़िया के हौसले का

कहती थी –कैसे लगी रहती है
दिन भर अपने काम में
शायद पत्नी देखती थी चिड़िया में
अपना ही अक्श

पड़ोसी कहते थे रोज
घोसले को हटाने की बाबत
कहते थे चिड़िया है तो
चिड़िया की तरह रहे

बाहर या किसी पेड़ पर बनाये
अपना घोंसला


ये क्या बात हुई
आज बरामदे में है
कल ड्राइंग रूम में आ जायेगी

आखिर
किसी भी चीज की हद होती है

उन्हीं दिनों हम ढूँढ़ रहे थे
एक नया घर

हमारी हिम्मत नहीं होती थी
कि कुछ भी ऐसा करें

कुछ ही दिनों बाद
हमने अपने
नये घर में प्रवेश किया
और अलविदा कहना पडा उस चिड़िया को

परंतु आज भी
इंतजार है उस चिड़िया का
जिसने नया घर ढ़ूँढ़ने में
हमारी बेहद मदद की
और शायद दुआयें भी.

20/11/07

त्वरित टिप्पणियों की टकसाल: हिन्दी कवि सम्मेलन

टिप्पणियों के बेताज बादशाह: श्याम ज्वालामुखी

ब्लाग पर टिप्पणियाँ देने का चलन आम है. मेरी जानकारी में हिन्दी ब्लाग पर टिप्पणियाँ देने मे उड़न तश्तरी वाले कनाडियन भारतीय समीर लाल जी का कोई तोड़ नहीं है. ब्लागर दोस्तों से टिप्पणियों के सन्दर्भ में बात चीत हो तो कई तो अक्सर ये सोंचते दिखते हैं कि समीर जी ने कोई बन्दा रखा हुआ है जो उनकी ओर से तुरत टिप्पणियाँ पोस्ट करता रहता है वर्ना सभी ब्लाग पर समीर जी की पहली टिप्पणी का जादू समझ के बाहर है. लोग समझ नहीं पाते हैं कि समीर जी अगर दिन रात ब्लाग पढते और टिप्पणियाँ ही करते रहते हैं तो वे बाकी काम कब करते होंगे.पर मेरा मानना है कि महान लोगों के काम करने का ढंग भी जुदा होता है. मुझे एक शेर याद आता है

कोई चार दिन की जिन्दगी मे सौ काम करता है
किसी की सौ बरस के जिन्दगी में कुछ नही होता.

मेरी समझ से यही समीर भाई का राज है.

बहरहाल मैं हिन्दी कवि सम्मेलनों की बात करना चाह रहा था. कवि सम्मेलन मे कविता तो महत्वपूर्ण होती ही है. पर श्रोताओं का प्रतिसाद जिस एक चीज पर सबसे ज्यादा मिलती है वह है कवि या संचालक द्वारा कवि सम्मेलन के दौरान के गई त्वरित टिप्पणियाँ.
त्वरित टिप्पणियाँ देने में कई मंचीय हिन्दी कवियों का कोई जवाब नहीं है. वर्तमान में सत्य नारायण सत्तन ,
अशोक चक्रधर , सुभाष काबरा ,अरुण जैमिनी ,कुमार विश्वास, किरण जोशी , सुनील जोगी आदि हिन्दी मंच के उन विरल विभूतियों में से हैं जो घटित हो रही घटनाओं पर अपनी त्वरित टिप्पणियों से श्रोता समूह पर एक जादू सा करते हैं और उन्हें आह्लादित कर देते हैं। स्वर्गीय श्याम तो इसके मास्टर ब्लास्टर थे और टिप्पणियों की वो बारिश करते थे कि लोग गिनती ही नही सुध बुध सब भूल जाते थे.

एक बारमेरी शादी हुई
किसी कवि का एक जुमला जिसे देश के कई कवि ले उड़े वो है”’एक बार’ मेरी शादी हुई” इस जुमले में ‘एक बार’ का जवाब नहीं है. श्रोता बरबस पूछ बैठते हैं –एक बार? और कवि कहता है – जी हाँ आप लोगों की कृपा से अभी तक एक बार ही हुई है.

माइक वाले को एडवांस में पेमेंट
अकसर कवि सम्मेलन मे माइक सिस्टम खराब हो जाता है. ऐसी स्थिति मे एक जुमला लोगों को बहुत गुदगुदाता है. कवि कहता है- लगता है आयोजकों ने माइक वाले को एडवांस में पेमेंट कर दिया है. श्रोताओं क यह टिप्पणी अनायास ही गुदगुदा देती है.

माईक पर गणेश जी खड़े हैं
दिल्ली के अरुण जैमिनी ग्वालियर निवासी प्रदीप चौबे के स्थूल शरीर पर छींटाकसी करते हुए अकसर कहते हैं- ऐसा लग रहा है माएक पर गणेश जी खडे हैं और प्रदीप चौबे आनन फानन अरूण जमिनी को लक्षित करते हुए कहते हैं – बड़े माईक पर गणेश जी खड़े हैं और छोटी माइक पर उनकी सवारी मौजूद है. इस पर श्रोता अनायास खिलखिला उठता है.

कविता वोई और कवि कोई
कवि सम्मेलन की वर्तमान अराजकता पर जिसमें जिसको मौका मिले जिसकी भी कविता हो बिना नाम तक लिए कवि पढ देता है तालियाँ लूट कर ले जात है टिप्पणी करते हुए व्यक्तिगत बातचीत मे श्याम ज्वालामुखी कहा करते थे. पहले के जमाने मे कवि सम्मेलन में वोई कवि और वोई कविता हुआ करती थी और अब कविता वोई और कवि कोई.

बिहारी आदमी की ताकत
पिछले दिनों माँ सरस्वती की कृपा से एक ऐसी ही टिप्पणी मेरे मुँह से भी निकली. हुआ यों के दादर में एक कवि सम्मेलन था. युगराज जैन बतौर संचालक निमंत्रित थे. कवि गण थे- महेश दूबे, सुरेश मिश्रा, अनिल मिश्र, मोतीलाल श्रीवास्तव, शिखा पांडेय और मैं खुद. युगराज भाई ट्रैफिक में कहीं फंसे हुए थे और आयोजक कार्यक्रम शुरू करने को आमादा हो रहे थे. आखिरकार सुरेश मिश्र ने कार्यक्रम का संचालन शुरू किया और मोतीलालजी को काव्यपाठ के लिए खड़ा कर दिया. उनके काव्यपाठ के उपरांत मुझे खड़ा करने से पहले मेरे राज्य बिहार की काफी ‘तारीफ’ की और यहाँ तक कहा कि जो तालियाँ नहीं बजायेगा उस श्रोता का अगला जन्म भी बिहार में होगा. पर इसी बीच मूल संचालक युगराज जैन पधार चुके थे. सुरेश मिश्रा ने युगराज जी को मंच पर बुलाया और संचालन का भार उन्हे सौपते हुए खुद कवियों के बीच स्थापित हो गये. सामने श्रोताओं के बीच महाराष्ट्र के पूर्व गृह राज्य मंत्री कृपा शंकर सिंह और वरिष्ट पत्रकार नन्द किशोर नौटियाल भी मौजूद थे. मैं माईक पर आया और पहला ही वाक्य मेरी कंढ से फूटा- आपको बिहारी आदमी की ताकत का अन्दाजा इसी से हो गया होगा कि उसके आने से पहले ही आदमी अपनी गद्दी छोड कर दूसरे को सौंप देता है. श्रोताओं की वह हंसी और उनके हाथ की वो तालियाँ .अहा हा क्या बताउँ ? मैं देर तक उस नशे मे रहा.

16/10/07

किस्सा प्याज और अपनी लुटी हुई लाज का


पत्नी बोली- तुम क्या कमाते हो

असल में तो पडोस का शर्मा कमाता है

उसके बीवी रोज

एक किलो प्याज खरीदती है

और सारा परिवार खाता है

तुमसे तो कुछ लाने को बोलूँ

तो आंखें लाल पीली होने लगती है

और प्याज के नाम पर

पतलून ढीली होने लगती है.

मैने कहा- फिजूल के खर्चे मत किया कर

और प्याज के ज्यादा चर्चे मत किया कर

ये चीज ही ऐसी धांसू है

कि पहले तो खाते वक्त आती थी

अब भाव सुन कर ही आंखों में आंसू है

क्या बताउँ दफ्तर मे चपरासी तक

बास के साथ लंच खाता है

क्योंकि अपनी टिफिन से निकाल कर

प्याज तो वही खिलाता है

अब तो लगता है

दूल्हा दहेज मे प्याज ही मांगेगा

और गले में नोटों की जगह

प्याज की माला टांगेगा

लडकी का पिता लडके के आगे

सिर के पगडी के बजाय

प्याज ही रखेगा

और मेरी लाज रख लीजिए के बजाय कहेगा

जी मेरा प्याज रख लीजिए

सास बहू को ताना मारेगी

अरे वो तो किस्मत ही खराब थी

जो यहाँ पे रिश्ता किया

वर्ना हमने तो अच्छे अच्छे प्याज वाले को

घर मे घुसने तक नही दिया

बडे बडे नेता खुद को

सिक्कों के बजाय प्याज से तुलवायेंगे

और अच्छे अच्छे कवि

प्याज पर कवितायें सुनायेंगे.

राजनीतिक पार्टियाँ अपना चुनाव चिह्न

प्याज रखेगी

और घर घर जाकर

प्याज बांटने वाली पार्टी ही

सत्ता का स्वाद चखेगी.

क्योकि प्याज की मारी जनता कहेगी

न हमे राम राज चाहिए

न कृष्ण राज चाहिए

हमे तो सिर्फ सस्ता प्याज चाहिए.

24/9/07

कविता पर क्रिकेट भारी है


ये वो है जो रिमोट पर कब्जा कर लेती हैं


दफ्तर से देवमणि पांडेय के साथ लौटते हुए चर्चगेट मे विनय पत्रिका वाले बोधिसत्व से मुलाकात हो गयी. उन्होने शिकायत की और कहा कि मेरा ब्लाग अच्छा है पर मै नियमित क्यो नही लिख रहा हूँ? मैने कहा कि कोशिश करूंगा.. फिर उन्होने बताया कि मुंबई मे हिन्दी के कुल जमा बारह ब्लागर है.पता नही बारह को वे जानते हैं या सचमुच सिर्फ बारह ही है. मै चाहूंगा कि बोधिसत्व बारह मुंबईया ब्लागरों की सूची मुझे और अन्य लोगो को भी उपलब्ध कराये.फिर उन्होने बताया कि पिछले दिनो मुंबई मे एक गुप्त ब्लागर मीट हुई जिसमे मुझे उन्होने इस लिए नही बुलाया क्योकि क्रिकेट मे ग्यारह खिलाडी ही होते है. मैने कहा चलिए ब्लागर मीट के बारे मे कुछ बाते कर ले तो बोले - अभी घर जाकर भारत पाकिस्तान का मैच देखूंगा. परिवार के साथ रहो तो बच्चों को भी अच्छा लगता है. इससे परिवार के प्रति उनके स्नेह का पता चला . अब ये निर्णय तो मै नही कर पाया कि परिवार के प्रति उनका स्नेह ज्यादा है या क्रिकेट के प्रति जूनून. पर यह ज्यादा अच्छा लगा कि हिन्दी के कवि लेखक जहाँ कविता कहानी के अलावा दुनिया मे किसी अन्य चीज का अस्तित्व ही नही मानते वही बोधिसत्व क्रिकेट जैसी चीजों मे भी अति रूचि रखते हैं उन्होंने वही सबवे के पास देवमणि को सहयाद्री रेस्तराँ मे चाय पिलाने का आदेश दिया और साथ मे कुछ खिलाने का भी. एक पंडित दूसरे पंडित से भोज कराने को कह रहा था और दोनो एक दूसरे की जेब हल्का करने को आमादा थे. बाद मे बोधि ने स्पष्ट किया कि अंधेरी से चर्चगेट के बेच मिलने पर चाय पानी का खर्चा देवमणि को उठाना है और अंधेरी से विरार के बीच बोधि खर्च उठायेंगे. उम्मीद है देवमणि आने वले समय मे अंधेरी की काफी यात्रायें करेंगे. मै तो सलाह दूंगा कि वे सीजन टिकट ही निकाल ले वर्ना उनका मामला भारत सरकार की तरह हमेशा घाटे मे रहेगा. बहरहाल घर आया तो पत्नी टी वी खोले क्रिकेट मे रमी हुई थी. वह क्रिकेट मैच के दौरान हमेशा रिमोट पर कब्जा कर लेती है. चाहे किसी मुशायरे या कवि सम्मेलन का प्रसारण किसी चैनल पे क्यो नही हो रहा हो. मै हमेशा तर्क देता हूँ कि मै कवि हूँ और इस हिसाब से अगर मुशायरे वगैरह का कार्यक्रम हो तो उस वक्त टी वी पर मेरा हक होना चाहिए क्योकि वह कोई क्रिकेटर होती तो जरूर उसे क्रिकेट देखने का हक होता. इस पर पत्नी बोलती है - दूसरों की शारती सुनने से मेरे लेखन पर दूसरों का प्रभाव पडने का खतरा है. इसलिए कविता पर हमेशा क्रिकेट भारी पडता है. फिर इस बार सीधे शाहरूख खान स्टेडियम मे अपने बेटे के साथ मौजूद थे और हर मौके पर तालियाँ बजा कर अपनी खुशी जाहिर कर रहे थे. पत्नी बोली - क्या कभी शाहरूख खान आपकी कविता सुनने आयेगा और अगर आ भी गया तो तालियाँ बजायेगा. मैने कहा आमिर खान ने जब किरण राव से शादी रचाई तो पंचगनी मे कवियों को बुलाया था. अच्छा पेमेंट किया था और काव्यानंद लिया था. पर पत्नी ने आमिर खान को सिरे से खारिज कर दिया कि जो आदमी अपनी पहली बीवी को बाय बाय कर दूसरी के साथ गुलछर्रे उडा रहा है उसकी तो बात ही क्या करनी. आदमी है तो शाहरूख . कभी किसी की ओर देखता तक नही. अब मेरी एक ही इच्छा है कि एक ऐसा कवि सम्मेलन हो जिसमे शाहरूख खान बतौर श्रोता आये और मेरी कवितायें सुन कर तालियाँ बजायें . खैर जब इंडिया ने आखिरी छक्का लगाया उससे पहले उसने डर के मारे टी वी ही बन्द कर दिया. मैने पूछा टी वी क्यो बन्द कर दिया. पत्नी बोली - मुझे लगा इंडिया शायद हार न जाये. मेरी तो जान ही निकल जाती. खैर इंडिया टीम को बहुत बहुत धन्यवाद . उसने मुझे विधुर होने से बचा लिया.


9/9/07

वो हमारे गांव की पगडडी थी ये हमारे महानगर की सड़के है

वो हमारा गाँव था
और वे थी हमारे गाँव की सडकें
सडकें भी कहाँ?
पगडंडियाँ!
टूटी फ़ूटी, उबर ख़ाबर
पर उन पर चल कर हम
न जाने कहाँ कहाँ पहुँच जाते थे
दोस्तों , रिश्तेदारो , नातेदारों
और न जाने किनके किनके घरों तक
ये हमारा महानगर है
यहाँ की सडकें बहुत सुन्दर है
चौडी चौडी, एक दम चिकनी
मगर इन पर चल कर
मैं कहाँ जाउँ?

27/8/07

हमने बेचारे माँ बाप को परिवार से छाँट दिया है

पिछले दिनों
अखबार में ये खबर पढकर
कि मुम्बई के मालाबार हिल इलाके की
एक बहुमंजिली इमारत से कूद कर
दो वृद्ध दम्पत्ति मर गये
मेरे दिल मे उदासी
और आंखों में आंसू भर गये
बहुत देर तक मैं उनके बारे में
सोंचता रहा
और उनकी ही बिल्डिंग के नीचे पडे
उनके मृत देह का दृश्य
मुझे कचोटता रहा
तब मुझे लगा
कि आजकल
हम अपने दायरे में
कुछ इस कदर सिमट गये हैं
कि हमे जन्म देने वाले
माँ बाप से ही हम कट गये हैं
हम दो हमारे दो के इस नारे ने
बस इतना भर किया है
कि परिवार का मतलब
सिर्फ मियाँ बीबी और
बच्चे भर रह गया है
हमने उन दोनो बेचारे माँ बाप को
परिवार से छाँट दिया है
किसी लैंड लाइन का
कनेक्शन समझ कर काट दिया है.
आजकल हर किसी के दिमाग में
यही घर कर रहा है
कि उसका काम तो मोबाईल से चल रहा है
और वो फालतू मे
हर महीने लैंडलाइन का बिल भर रहा है
लेकिन हम ये भूल जाते हैं
कि माँ बाप चाहे कहीं भी रहें
हम पल भर भी
उनके आशीर्वाद के कवरेज एरिया से
बाहर नही जाते हैं
और तो और
अरे ये मोबाईल का कनेक्शन लेते वक्त भी
ये लैंडलाइन ही है
जिनके बिल हमारे काम आते हैं
हम अगर समय पर नहीं चेते
तो अपने किये का नतीजा भुगतेंगे
सिर्फ और सिर्फ पछतायेंगे
उस दिन कुछ भी नही कर पायेंगे
जिस दिन हमारे बच्चे
खुद हमारे नेट वर्क ऐरिया के
बाहर चले जायेंगे.

20/8/07

ये बात भी झूठी है

आप कहते हैं
ये दुनिया झूठी है
यहाँ के लोग झूठे हैं
उनकी बातें झूठी है
फिर ये बात सच्ची है
इसकी क्या गारंटी है
सच तो ये है
कि ये बात भी झूठी है.

16/8/07

दूसरा ईसा मसीह


कच्ची नींद से जागता हूँ
काम पे भागता हूँ
यहाँ वहाँ भटकता हूँ
रोज सूली पर लटकता हूँ
सोंचता हूँ

जब हम नहीं रहेंगे
लोग हमें कहीं
दूसरा ईसा मसीह तो नहीं कहेंगे.

12/8/07

चूहेदानी




एक चूहे को
मैने चूहेदानी मे पकड़ा
पकडे जाने पर
उसकी छटपटाहट देख
मै भी छटपटा उठा
और चूहेदानी खोल दी
सोंचता हूँ
मैंने चूहे को पकड़ा जरूर
पर आखिर में चूहे ने मुझे पकड लिया


7/8/07

दुनिया के पुराने सात आश्चर्य

दुनिया के सात आश्चर्यों की बड़ी चर्चा रही पिछले दिनों. पर मेरे दोस्त रवीन्द्र प्रभात ने जिन नये सात आश्चर्यों की चर्चा की तो मुझे लगा ये तो आठवाँ आश्चर्य है कि दुनिया जिन चीजों को सात आश्चर्यों में शुमार करती है वे दरअसल एक बचकानेपन की बात है. लिजिए उनकी जुबान से ही सुनिये-
प्रिय बसंत जी,
आज मैं जीवन के जिन सात आश्चर्यों की चर्चा करने जा रहा हूं उन्हीं सात आश्चर्यों में से
एक है हँसना और हँसने का हीं उत्कृष्ट रूप है ठहाका. यही दुआ है कि ठहाका के मध्यम
से मिलने- मिलाने का यह माध्यम बना रहे..

आपने मेरे बारे में जो लिखा है, उतना सौभाग्यशाली मैं हूं नहीं, यह तो आपकी महानता है जनाब, जो इतना महसूस किया...... पिछले दिनों ताज को दुनिया के सात अजूबों में मार कराने के लिए भारत के लोगों ने काफ़ी मशक्कत की. अच्छी बात है, पर यदि हम अपने भीतर की यात्रा करते हुए जीवन के सात अजूबों का एहसास कर सकें , तो इसमें कोई संदेह नहीं कि जीवन बहुत हीं ख़ूबसूरत और सारगर्भित हो जाएगा . अब आप कहेंगे कि जीवन के सात अजूबे कौन से हैं? तो मेरा जवाब यही होगा कि वह है-देखना,सुनना, स्पर्श करना, महसूस करना,हँसना,रोना और प्यार करना.
चौंक गये क्या जनाब ? चौंकिए मत, यही सच है. इस दुनिया को देख पाना एक सुखद आश्चर्य है, जिसने दुनिया को विविधता का रंग दिया, उसी ने हमें देखने की शक्ति दी .हम हिमालय की उँचाई को देख सकते हैं, ताजमहल की खूबसूरती को निहार सकते हैं, वहीं सड़क पर पड़े कचरे को भी देखते हैं. हमारे पास अंदर झाँक ने की शक्ति भी है, जिससे हमें अपने भीतर मौजूद असीमित संभावना दिखती हैं,जो दुनिया को ख़ूबसूरत बना सके. उसी प्रकार हमारे पास सुनने की अद्भुत क्षमता है. हम बादलों के अट्टहास सुन सकते हैं, तो चिड़ियों के कलरव भी, हम दुनिया की भी सुनते हैं और अपने मन की आवाज़ को भी. इसलिए सुनना जीवन का दूसरा सबसे बड़ा आश्चर्य है.
मनुष्य का जीवन बड़ा क़ीमती है, पर सुनना नही आया तो जीवन का कोई उपयोग नहीं.राह पर चलते हुए हर राहगीर को सड़क पर गिरे सिक्के का स्वर अचानक अचम्भित करता है, किंतु वहीं राह के किनारे किसी घायल की व्यथा के मौन स्वर सुनने का भान शायद किसी- किसी को प्राप्त है. सुनना एक ऐसी पारस मनी है, जो अंदर से बाहर तक मनुष्य को स्वर्णयुक्त बना देता है. छूना अर्थात स्पर्श करना एक ऐसी शक्ति है, जो व्यक्ति के भीतर उर्जा का संचरण करती है. यदि कोई दुखी है, पीड़ित है और उसके कंधे पर हाथ रख दिया जाए, तो निश्चित रूप से उसकी पीड़ा कम हो जाएगी. रोते हुए बच्चे को अचानक माँ द्वारा गोद उठा लेना और संस्पर्श का एहसास पाकर बच्चे का चुप हो जाना यह दर्शाता है कि स्पर्श हमारा भावनात्मक बल है.
इसी प्रकार महसूस करना अर्थात भावनात्मक होना मनुष्य की आंतरिक जीवन दृष्टि है, जहाँ आकार लेता है जीवन मूल्यों का सह अस्तित्व, क्योंकि कहा गया है कि जिससे हमारी भावना जुड़ जाती हैं, उसकी प्रशंसा करने अथवा प्रशंसा सुनने में भावनात्मक संतुष्टि मिलती है. यही है जीवन का चौथा आश्चर्य. उसी प्रकार हँसना प्रकृति के द्वारा प्रदत एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. हँसना एक चमत्कार है, आश्चर्य है, क्योंकि हँसने से जहाँ ज़िंदगी के स्वरूप और उद्देश्य का भाव प्रकट होता वहीं नीरसता , उदासीनता और दुख का भाव नष्ट करते हुए आनन्द्परक वातावरण का निर्माण करता है. यह भाव केवल मनुष्य में ही होता है. उसी प्रकार जब आदमी रोता है तब सबसे ज़्यादा सच्चा होता है, उजला होता है. रोना
कायरता नहीं है,
खूद का सामना करने की ताक़त की निशानी है. राष्ट्र कवि दिनकर ने कहा है, कि जिसका
पुण्य प्रबल होता है वही अपने आँसू से धूलता है. इसलिए रोना छठा सबसे बड़ा आश्चर्य
है. कहा गया है, कि लगाव, दोस्ती,इश्क़,ममत्व और भक्ति हमारी पाँच उंगलियाँ है,. जो
जीवन की मुट्ठी को मजबूत करती है. किसी कठिनाई और समाधान के बीच उतनी हीं
दूरी है, जितनी दूरी हमारे घूटनों और फ़र्श में है, जो घुटने मोड़कर ईश्वर के सामने झुकता
है, वह हर मुश्किल का सामना करने की शक्ति पा लेता है. यही है प्यार, जो जीवन का
सातवाँ आश्चर्य है. शायद हमारी बातों से सहमत हो गये होंगे आप?

रवीन्द्र जी की इस सोंच को मैं नूतन कपूर के इस शेर से खत्म करता हूँ आँखों से तो केवल उसका आना जाना था उसका दिल के भीतर के भी भीतर कही ठिकाना था.

26/7/07

मेरा कुत्ता

मेरा कुत्ता नेता हो गया है
लोगों का चहेता हो गया है
जहाँ भी जाये
जुगत भिड़ा लेता है
भाषण देने लगे
तो जमा देता है
कुत्ता मेरा है --
पर काम आपके भी आ सकता है
मसलन मनचाही जगह
आपकी ट्रांसफर करा सकता है
या पड़ोसियों को
झूठे मुकदमे में फँसा सकता है
आप कहेंगे
फाँक रहा है
इसका कुत्ता है न
इसीलिये हाँक रहा है
मगर झूठी बात नहीं करता हूँ
ऐसा इसीलिए कहता हूँ
क्योंकि पहले मेरा कुत्ता
खाना खाने के बाद
पाँच घंटे के लिए गायब हो जाता था
फिर वह पाँच पाँच हफ़्‍ते पर आने लगा
और कुछ दिनों बाद तो
पाँच महीने पर आकर खाने लगा
और अब तो बिल्कुल गजब ढाता है
खाना खाने के बाद
पाँच साल के लिए गायब हो जाता है
बीच में एक बार भी नहीं आता है
इसीलिए तो कहता हूँ
मेरा कुत्ता नेता हो गया है
लोगों का चहेता हो गया है

नेता और वसीयत

एक पागल कुत्ते ने


एक कठोर दिल नेता के


मुलायम पृष्ठ भाग को नोचा


तो नेता तो अब जरूर मर जायेगा


ऐसा लोगों ने सोंचा


लोग देखने के लिए गये कि


कुत्ता काटा नेता कैसा दिख रहा है


पर अरे ये क्या


नेता तो आराम से कुर्सी पर बैठा


कागज कलम लिए कुछ लिख रहा है


लोगों ने कहा- नेताजी


क्या वसीयत लिख रहे हो


नेता बोला- वसीयत लिख कर वसीयत क्या मैं चाटूंगा


अरे मैं तो लिस्ट बना रहा हूँ


कि कल सुबह किनको किनको काटूँगा.

5/7/07

रेलवे रिजर्वेशन

सुबह सुबह पिताजी ने सोते से जगाया
और एक जोरदार लेक्चर सुनाया.
बोले तुम से तो कुछ भी नहीं हो पाता है
शर्मा जी के लड़के को देखो
बन्दे ने क्या कमाल करके दिखाया है.
बिना दलाल से मिले रेलवे रिज़र्वेशन काउंटर से
गर्मी की छुट्टी में गाँव जाने का कनफर्म टिकट ले कर आया है
अरे जरा भी शर्म है तो होश में आओ
और कहीं जाकर चुल्लू भर पानी में डूब जाओ
पिताजी का रूख देखकर मन ही घबरा गया
और सच बताउँ तीन बार चक्कर भी आ गया
तो पिताजी बोले तू तो ऐसे घबरा रहा है
जैसे रिज़र्वेशन काउंटर कोई लन्दन में है
अरे बेटे स्थिति तनाव पूर्ण किंतु नियंत्रण में है
तो अगली सुबह नहा धोकर मैंने जैसे ही
रिज़र्वेशन सेंटर जाने के लिए कदम बढ़ाया
माताजी का कोमल स्वर आया
बेटे मैं तुम्हें ऐसे ही नहीं जाने दूंगी
तू आज पहली बार टिकट लेने जा रहा है
मैं माता दुर्गे का व्रत रखूंगी
दादी माँ ने तो कमाल ही कर दिया
पुरानी सन्दूक से एक तावीज निकाल कर लायी
और मेरे बाँह में बान्ध दिया
भाभी बोली – दिन का खाना साथ रख लो
भूख लगेगी तो काम आयेगा
रात का खाना छोटा भाई तुझे दे आएगा
तो बड़े भाई बोले बिस्तर भी साथ रख लो
क्या पता काम हो आये टिकट ही लाने जा रहे हो
कहीं रात दो रात रुकना हो जाये
बड़ी बहन बोली- अब जब जा ही रहे हो रिज़र्वेशन कराने
क्या होगा ये तो भगवान ही जाने
छोटी बहन बोली- भैया मेरे साथ इंसाफ करना
मेरा कुछ कहा सुना हो तो माफ करना
खैर साहब किसी तरह घर वालों से पीछा छुरा कर बाहर आया
तो सामने एक बीमा का एजेंट नजर आया हमें देखते ही मुस्कुराया
बोला- रिज़र्वेशन कराने जा रहे हो
बहुत बड़ा रिस्क उठा रहे हो
पहले अपना बीमा कराओ
फिर टिकट लेने के लिए जाओ
पड़ोसी ने सुना तो बोला_ एक जरूरी काम कर लिया है
अरे अपनी वसीयत लिख कर रख दिया है.
खैर साहब रिज़र्वेशन सेंटर पहुँचे तो अजीब नजारा था
दृश्य बड्रा सुन्दर बड़ा प्यारा था क़तारों में कतार थी
भीड़ एक दूसरे के सिर पर सवार थी;
किसी की ज़बान पर जीसस किसी के मुँह पर अल्लाह
तो किसी के मन में हनुमान था
पूरा रिज़र्वेशन सेंटर अपने आप में एक छोटा सा हिन्दुस्तान था
लोग लेटे थे बैठे थे खड़े थे
कुछ तो बिस्तर बिछाये पड़े थे
तो हनुमान चालीसा पढ़ता हुआ
मैं भी एक कतार में खड़ा हुआ
आगे खड़ा बूढ़ा अखबार पढ़ रहा था
बड़ा निश्चिंत लग रहा था
मैंने कहा क्या पेपर आज का है
वो बोला जी नहीं पिछले इतवार का है
मैं बोला क्यू भाया
बोला- क्या करुँ उसके बाद से इधर कोई बेचने ही नहीं आया
मैं ने कहा – आज मेरी मां ने माता दुर्गे का व्रत रखा है
मैं टिकट लेकर जाउंगा तो प्रसाद खिलायेगी
बगल में खड़ा बूढा बोला- बेचारी दिन भर का उपवास करके
मुफ्त में पछतायेगी
तुम्हे नहीं मालूम इस टिकट की कतार ने
मेरी जिन्दगी का कितना बड़ा हिस्सा लिया है
अरे मैंने तो अपनी लड़की का रिश्ता भी
अभी अभी इसी कतार में तय किया है
मैंने कहा कौन है कौन है?
मतलब आपका होने वाला रिश्तेदार बोला खुद नहीं समझ सकते
अरे और कौन ये काउंटर पर बैठा सरदार
मैं ने कहा इस बूढ़े खूसट से करेंगे अपनी लड़की की शादी
तब तो हो गई उसकी पूरी बरबादी
बोला बरबादी किस की है ये तो वक्त ही बतलायेगा
लेकिन हर साल गर्मी में गाँव जाने का टिकट तो आसानी से मिल जायेगा
तो मित्रों इसी तरह सुबह का सूरज शाम को अस्त हो रहा था
और मैं भी ख्डा खड़ा बिल्कुल पस्त हो रहा था.
बजने को थे रात के आठ
और आगे अभी भी आगे आदमी खड़े थे साठ
तभी भगदड़ सी मची शोर में मेरा स्वर मन्द हो गया
और देखते ही देखते काउंटर भी बन्द हो गया
तो खाली हाथ घर आये मुँह लटकाये
अब कैसे बतायें कैसे बताय़ें कि टिकट नहीं मिला है
कि टिकट मिलना एक भरम है एक भुलावा है
एक धोखा है एक छलावा है
सो कुछ कह नहीं पाया तो मुँह लटका कर ख़डा हो गया
तो बड़ा भाई बोला टिकट तो मिला नहीं क्या फायदा मुंह लटकाने से ?
बन्द करो इस नाटक को चेहरे पे बारह बज रहे हैं
जैसे चेहरा नहीं अनाथालय का फाटक हो.
मगर इससे पहले कि कुछ बताता
अपनी सफाई मैं कुछ सुनाता
बड़ी बहन आ कर पीठ सह लाने लगी
छोटी ढाढ़स दिलाने लगी
बोली ये भी अच्छा है कि टिकट की किल्लत है.
आसानी से नहीं मिलती है.
पर आज के जमाने में क्या पता
कब कहाँ कौन सी ट्रेन में बम का धमाका हो जाये
और हम गाँव पहुंचने के बजाय कहीं और पहुंच जायें
तो मित्रों कविता समाप्त हुई
पर आप तालिय़ाँ बजाने का कष्ट मत कीजिए
और कविता जरा सी भी पसन्द आई हो
Pतो अगली गर्मी की छुट्टी में गाँव जाने की
पाँच कनफर्म टिकट दिलवा दीजिए.